
30 कछुओं के पीछे कौन? इंदौर में गिरफ्तारी के बाद खुलने लगी तस्करी की परत, महाराष्ट्र तक पहुंची जांच
इंदौर में 30 संरक्षित कछुओं के साथ पकड़े गए दो आरोपियों की रिमांड के बाद वन विभाग ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है। मोबाइल और पूछताछ से मिले सुरागों के आधार पर महाराष्ट्र समेत दूसरे राज्यों में सप्लाई नेटवर्क की पड़ताल की जा रही है।

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इंदौर। शहर में 30 कछुओं की बरामदगी के बाद वन विभाग की जांच अब सिर्फ आरोपियों तक सीमित नहीं रही है। स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स की कार्रवाई में पकड़े गए दो युवकों से पूछताछ के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं, जिनसे कछुआ तस्करी के नेटवर्क के दूसरे राज्यों तक फैले होने की आशंका बढ़ी है। टीम अब यह पता लगाने में जुटी है कि संरक्षित कछुओं की सप्लाई कहां से होती थी और इंदौर के बाद इन्हें किन लोगों तक पहुंचाया जाना था।
दो आरोपी, 30 कछुए और तीन मोबाइल जब्त
मुसाखेड़ी निवासी केशव शर्मा और रोहन गौड़ को वन विभाग ने कछुओं की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया है। दोनों को अदालत में पेश करने के बाद 24 अगस्त तक वन विभाग की रिमांड पर लिया गया है। कार्रवाई के दौरान उनके पास से 30 कछुओं के साथ तीन मोबाइल फोन भी बरामद किए गए हैं। अब मोबाइल में मिले नंबरों, बातचीत और दूसरे डिजिटल सुरागों के आधार पर तस्करी की कड़ियां जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
बरामद कछुओं की पूरी तस्वीर
कछुए की प्रजाति | बरामद संख्या |
|---|---|
इंडियन स्टार टॉरटॉइज | 14 |
इंडियन रूफ्ड टर्टल | 10 |
स्पॉटेड पॉन्ड टर्टल | 6 |
कुल | 30 |
वन विभाग के मुताबिक बरामद तीनों प्रजातियां संरक्षित वन्यजीव हैं और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत आती हैं। यही वजह है कि मामले को सामान्य वन्यजीव बरामदगी के बजाय गंभीर तस्करी के रूप में देखा जा रहा है।
कछुओं की डिलीवरी से लेकर ग्राहक तक, काम बंटा हुआ था
पूछताछ में सामने आया है कि दोनों आरोपियों की भूमिका अलग-अलग थी। जांच के मुताबिक केशव ग्राहकों से संपर्क कर सौदा तय करता था, जबकि रोहन कछुओं को संबंधित लोगों तक पहुंचाने का काम करता था। अब वन विभाग यह जानने की कोशिश कर रहा है कि इनके पीछे नियमित रूप से कछुए उपलब्ध कराने वाला व्यक्ति या समूह कौन था।
अधिकारियों की नजर उन संपर्कों पर भी है, जिनके जरिए संभावित खरीदारों तक पहुंच बनाई जाती थी। मोबाइल फोन से मिले डिजिटल सुराग इस जांच में अहम माने जा रहे हैं।
महाराष्ट्र कनेक्शन ने बढ़ाई जांच की रफ्तार
शुरुआती पूछताछ में महाराष्ट्र समेत दूसरे राज्यों से संपर्क के संकेत मिलने के बाद जांच का दायरा इंदौर से बाहर तक बढ़ गया है। टीम अब यह पता कर रही है कि कछुओं को मध्य प्रदेश में कहां से लाया जाता था और क्या इसके लिए पहले से कोई तय सप्लाई चैन काम कर रही थी।
जांचकर्ताओं के सामने यह भी सवाल है कि दोनों आरोपी इस काम में कितने समय से जुड़े थे। अगर पुराने संपर्क और लगातार होने वाली सप्लाई के सबूत मिलते हैं, तो मामले में और लोगों के नाम सामने आ सकते हैं।
जांच में अब इन सवालों के जवाब तलाश रही टीम
जांच का सवाल | टीम की पड़ताल |
|---|---|
कछुए आए कहां से? | इन्हें आरोपियों तक पहुंचाने वाले सप्लायर की तलाश |
किसे देने थे? | संभावित खरीदारों और संपर्कों की जांच |
कहां से लाए गए? | इंदौर तक पहुंचने के रास्ते और दूसरे राज्यों के कनेक्शन की पड़ताल |
पीछे कौन है? | मोबाइल और संपर्कों के जरिए नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने की कोशिश |
सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है कछुओं की मांग
वन विभाग की जांच में यह पहलू भी सामने आया है कि इन प्रजातियों के कछुओं की मांग इंदौर के अलावा दूसरे राज्यों में भी है और इनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बाजार मौजूद होने की बात सामने आई है। इसी वजह से अधिकारियों को आशंका है कि बरामदगी किसी छोटे स्तर की गतिविधि का हिस्सा नहीं हो सकती।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े किसी व्यक्ति या संगठन की भूमिका की अभी पुष्टि नहीं हुई है। वन विभाग फिलहाल आरोपियों से पूछताछ और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे की कड़ियां तलाश रहा है।
अब सप्लायर और खरीदार तक पहुंचने की कोशिश
वन विभाग की प्राथमिकता अब बरामद 30 कछुओं से आगे बढ़कर पूरे नेटवर्क की पहचान करना है। आरोपियों से पूछताछ, मोबाइल फोन की जांच और दूसरे राज्यों से जुड़े संपर्कों की पड़ताल के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि वन्यजीवों को पकड़ने से लेकर उनकी डिलीवरी तक कौन-कौन लोग शामिल हैं।
अगर जांच में सप्लाई और खरीद के बीच की पूरी श्रृंखला सामने आती है, तो इंदौर में हुई यह कार्रवाई कछुआ तस्करी के बड़े नेटवर्क तक पहुंचने का आधार बन सकती है। फिलहाल दोनों आरोपी वन विभाग की रिमांड पर हैं और पूछताछ जारी है।
