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लाइट हाउस प्रोजेक्ट पर HC में केंद्र का जवाब: तकनीकी खामी से इनकार, रहवासियों के बदलावों पर उठाए सवाल
इंदौर के लाइट हाउस प्रोजेक्ट में सीपेज और अन्य शिकायतों पर केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया है।लोकस्वामी ग्राफिक्स
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लाइट हाउस प्रोजेक्ट पर HC में केंद्र का जवाब: तकनीकी खामी से इनकार, रहवासियों के बदलावों पर उठाए सवाल

Digital News Desk3 min read22/08/26

इंदौर के लाइट हाउस प्रोजेक्ट में सीपेज, दरार और लिफ्ट की शिकायतों पर केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में जवाब दाखिल किया है। केंद्र ने निर्माण में तकनीकी खामी से इनकार करते हुए कुछ फ्लैटों में अनधिकृत बदलाव और व्यावसायिक इस्तेमाल को समस्याओं की वजह बताया है।

Lokswami AI

इंदौर। कनाड़िया रोड-देवगुराड़िया स्थित लाइट हाउस प्रोजेक्ट में सीपेज, दरार और लिफ्ट से जुड़ी शिकायतों पर अब केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखा है। आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने 42 बिंदुओं वाले शपथ पत्र में प्रोजेक्ट की निर्माण गुणवत्ता पर उठ रहे सवालों को खारिज किया है। मंत्रालय का कहना है कि भवन का निर्माण तय तकनीक और गुणवत्ता मानकों के तहत हुआ था और निर्माण के दौरान आईआईटी मद्रास से थर्ड पार्टी क्वालिटी एश्योरेंस भी कराया गया।

1024 फ्लैट वाले प्रोजेक्ट पर उठे थे सवाल

प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत तैयार इस प्रोजेक्ट में एस+8 संरचना के 1024 फ्लैट बनाए गए हैं। केंद्र के अनुसार करीब 980 परिवारों को मकानों का कब्जा दिया जा चुका है। परियोजना पर लगभग 128 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं, जबकि एक फ्लैट की लागत करीब 12.50 लाख रुपए बताई गई है।

इस मामले में नरेंद्र गोस्वामी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। केंद्र ने अपने जवाब में याचिका को खारिज करने का अनुरोध किया है।

निर्माण तकनीक की विशेषज्ञों ने की थी जांच

मंत्रालय के मुताबिक लाइट हाउस प्रोजेक्ट के लिए प्रीफैब्रिकेटेड सैंडविच पैनल और प्री-इंजीनियर्ड स्टील स्ट्रक्चरल सिस्टम तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इस तकनीक को ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी चैलेंज-इंडिया के तहत चुना गया था।

केंद्र का कहना है कि तकनीक और डिजाइन की जांच सिर्फ एक एजेंसी तक सीमित नहीं रही। आईआईटी दिल्ली, आईआईटी बॉम्बे, सीबीआरआई रुड़की और बीएमटीपीसी के विशेषज्ञों ने भी तकनीकी प्रक्रिया में भूमिका निभाई। निर्माण के दौरान आईआईटी मद्रास ने गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी की और मई 2023 में प्रोजेक्ट क्लोजर रिपोर्ट भी दी।

दीवार और प्लंबिंग में बदलाव को बताया बड़ी वजह

केंद्र ने मई-जून 2026 में हुए संयुक्त निरीक्षण का हवाला देते हुए कहा है कि कुछ फ्लैटों में बिना अनुमति बदलाव पाए गए। मंत्रालय के अनुसार कुछ रहवासियों ने दीवारों में बदलाव करने के साथ प्लंबिंग व्यवस्था में भी छेड़छाड़ की।

केंद्र का तर्क है कि इस तरह के अनधिकृत निर्माण और बदलाव भवन की मूल व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। मंत्रालय ने हाईकोर्ट में निरीक्षण से जुड़ी तस्वीरें भी पेश की हैं।

फ्लैटों में दुकान से लेकर जिम तक चलने का दावा

शपथ पत्र में केंद्र ने एक और मुद्दा उठाया है। मंत्रालय के मुताबिक कुछ आवासीय फ्लैटों का इस्तेमाल कारोबार के लिए किया जा रहा है। इनमें किराना दुकान, मेडिकल स्टोर, ब्यूटी पार्लर, टेलरिंग, डिस्पेंसरी और जिम जैसी गतिविधियां चलने का दावा किया गया है।

कुछ मकानों को नियमों के विपरीत किराए पर दिए जाने की बात भी केंद्र ने कही है। इसके अलावा लिफ्ट में दोपहिया वाहन ले जाने की शिकायत का उल्लेख करते हुए मंत्रालय ने इससे लिफ्ट पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना जताई है।

RWA और हैंडओवर में देरी का भी जिक्र

केंद्र ने प्रोजेक्ट के रखरखाव से जुड़े विवाद के लिए टेकओवर की प्रक्रिया में हुई देरी का भी उल्लेख किया है। मंत्रालय के अनुसार अक्टूबर 2023 में प्रोजेक्ट का लोकार्पण होने के बाद मध्य प्रदेश सरकार और इंदौर नगर निगम को औपचारिक हैंडओवर की प्रक्रिया पूरी करनी थी।

केंद्र का कहना है कि नगर निगम ने अक्टूबर 2024 तक औपचारिक टेकओवर नहीं किया। वहीं रहवासियों के लिए रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन यानी RWA का गठन मार्च 2026 में हुआ।

सीपेज की मरम्मत अब भी जारी

सीपेज और दूसरी शिकायतों को लेकर केंद्र ने यह भी बताया कि ठेकेदार की पांच साल की डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड है। इस अवधि में निर्माण से संबंधित कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी निर्माण एजेंसी की है।

मंत्रालय के अनुसार शिकायतों के बाद वॉटरप्रूफिंग, पाइप बदलने और टाइल्स की मरम्मत जैसे काम कराए गए हैं। इसके लिए विशेष टीम भी लगाई गई है। केंद्र का कहना है कि टेकओवर में देरी के दौरान भी ठेकेदार ने एसटीपी, कॉमन एरिया की बिजली-पानी और सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएं अपने स्तर पर संभाली थीं।

अब याचिकाकर्ता के जवाब पर नजर

केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में साफ तौर पर कहा है कि लाइट हाउस प्रोजेक्ट की निर्माण तकनीक में कोई गंभीर तकनीकी या संरचनात्मक खामी नहीं है। मंत्रालय ने मौजूदा समस्याओं के पीछे अनधिकृत बदलाव, फ्लैटों के व्यावसायिक इस्तेमाल और रखरखाव व्यवस्था से जुड़े पहलुओं को प्रमुखता से रखा है।

अब हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता और दूसरे पक्षों की दलीलों के बाद यह तय होगा कि प्रोजेक्ट में सामने आई शिकायतों के लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है और आगे क्या कार्रवाई की जानी चाहिए।

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