विजय शाह को राहत: कर्नल सोफिया मामले में राज्यपाल की मुहर, समझें पूरा घटनाक्रम और आगे क्या होगा
कर्नल सोफिया कुरैशी विवाद में मंत्री विजय शाह पर मुकदमा न चलाने के प्रस्ताव को राज्यपाल मंगूभाई पटेल की मंजूरी मिली। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में हस्तक्षेप से इनकार किया, अब सक्षम प्राधिकारी के फैसले के आधार पर तय होगी अगली कानूनी राह।

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मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कुंवर विजय शाह को कर्नल सोफिया कुरैशी विवाद मामले में बड़ी राहत मिली है। सोमवार देर रात राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने मंत्री के खिलाफ अभियोजन चलाने की अनुमति न देने के मध्य प्रदेश कैबिनेट प्रस्ताव पर सहमति दे दी। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को हुई सुनवाई के तुरंत बाद आया। राज्यपाल के भोपाल लौटने पर मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल लोक भवन पहुंचे और उनसे मुलाकात के बाद फाइल राज्यपाल के समक्ष रखी गई, जिस पर अवलोकन के बाद उन्होंने मुहर लगा दी।
विवाद कैसे शुरू हुआ
11 मई 2025 को इंदौर के महू स्थित रायकुंडा गांव में एक कार्यक्रम के दौरान विजय शाह ने ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर एक टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने आतंकवादी हमलों का बदला लेने के लिए कुरैशी को भेजे जाने की बात इस तरह कही कि इसे कुरैशी की गरिमा पर सीधा हमला माना गया। बयान सामने आते ही देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए पुलिस को शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया — 14 मई की रात इंदौर के मानपुर थाने में मामला दर्ज हुआ। हाईकोर्ट ने बाद में एफआईआर की भाषा पर भी नाराजगी जताई थी।
शाह ने इस मामले में अब तक चार बार सार्वजनिक माफी मांगी है, पहली बार बयान के अगले ही दिन।
सुप्रीम कोर्ट का अब तक का रुख
हाईकोर्ट के आदेश को शाह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया। 28 मई 2025 को कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यवाही बंद कर SIT से स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। 28 जुलाई 2025 को कोर्ट ने शाह को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि माफी को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड पर न रखना अदालत के धैर्य की परीक्षा लेने जैसा है। इस साल जनवरी में कोर्ट ने राज्य सरकार को अभियोजन मंजूरी पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था, जिसके बाद मामला महीनों कैबिनेट में लटका रहा।
सोमवार की सुनवाई में क्या हुआ
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने SIT ने बताया कि जांच पूरी हो चुकी है और रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत में पेश कर दी गई है, लेकिन चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने के लिए अभियोजन की मंजूरी जरूरी है। सरकार की ओर से बताया गया कि कैबिनेट फैसला ले चुकी है और फाइल राज्यपाल के पास अंतिम निर्णय के लिए भेजी गई है।
यहां अहम मोड़ यह रहा — सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन मंजूरी के मुद्दे पर हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि यह फैसला सक्षम प्राधिकारी यानी राज्यपाल पर छोड़ा जाए। कोर्ट ने यह भी पूछा कि अगर मंजूरी नहीं मिलती तो आगे क्या होगा, जिस पर SIT ने बताया कि ऐसी स्थिति में संबंधित अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी जाएगी।
आगे क्या होगा
राज्यपाल की मंजूरी के बाद अब स्थिति साफ है — चूंकि अभियोजन की अनुमति नहीं दी गई, SIT को संबंधित ट्रायल कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, जिससे मुकदमा शुरू होने का रास्ता व्यावहारिक रूप से बंद हो जाएगा। पूरी फाइल और SIT रिपोर्ट अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी रखी जाएगी, जहां कोर्ट पहले ही यह रुख साफ कर चुका है कि वह सक्षम प्राधिकारी के फैसले में दखल नहीं देगा। यानी अगली सुनवाई में तकनीकी तौर पर मामला बंद होने की औपचारिकता ही बचेगी, जब तक कि याचिकाकर्ता या कोई अन्य पक्ष क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती न दे।

