देश का सबसे स्वच्छ शहर, प्रदेश की सबसे गंदी नदी: इंदौर की खान नदी पर NGT सख्त, तीन राज्यों को नोटिस
स्वच्छता में नंबर वन इंदौर की खान नदी सीपीसीबी की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश की सबसे प्रदूषित नदी निकली। एनजीटी ने एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकार से चार हफ्ते में जवाब मांगा। 28 सितंबर को अगली सुनवाई।

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इंदौर देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब लगातार जीतता आया है, लेकिन इसी शहर से गुजरने वाली खान (कान्ह) नदी को अब मध्य प्रदेश की सबसे प्रदूषित नदी घोषित किया गया है। यह दावा किसी सामाजिक संगठन का नहीं, बल्कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की जल गुणवत्ता रिपोर्ट का है। रिपोर्ट में इंदौर की खान नदी को कबीट खेड़ी से रामवासा स्टॉप डैम के बीच प्राथमिकता श्रेणी-1, यानी अति-प्रदूषित श्रेणी में रखा गया है। मतलब साफ है, यहां पानी इतना जहरीला है कि उसका इस्तेमाल फर्श साफ करने जैसे बुनियादी काम में भी नहीं किया जा सकता।
खान नदी अकेली नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश की 48 में से 18 नदियां 36 स्थानों पर बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) के मानकों पर पूरी तरह फेल पाई गई हैं।
पूरी सूची: कौन सी नदी कहां और कितनी प्रदूषित
सीपीसीबी की रिपोर्ट (टेबल 3.16) में मध्य प्रदेश की सभी 18 प्रदूषित नदी पट्टियों को प्राथमिकता श्रेणी के आधार पर बांटा गया है। श्रेणी-I सबसे ज्यादा प्रदूषित मानी जाती है, श्रेणी-V सबसे कम।
क्र. | नदी | प्रदूषित पट्टी / स्थान | प्राथमिकता श्रेणी |
|---|---|---|---|
1 | चंबल | नागदा डाउनस्ट्रीम से गांधीसागर डैम के पास फिश फार्म तक | I (सर्वाधिक प्रदूषित) |
2 | खान | कबीट खेड़ी से रामवासा स्टॉप डैम तक | I (सर्वाधिक प्रदूषित) |
3 | बेतवा | कंजिया रोड ब्रिज से विदिशा में बैस नदी संगम के बाद तक | II |
4 | हिरन | पारियात नदी संगम के बाद, ग्राम गनियारी रोड ब्रिज के पास, जबलपुर | III |
5 | क्षिप्रा | महिदपुर शहर के अपस्ट्रीम से त्रिवेणी संगम तक | III |
6 | कुंदा | खरगोन के पास | IV |
7 | सोन | चितावल के पास रोड ब्रिज, जिला चित्रांगी | IV |
8 | बासली | गोहद डैम, गोहद | V |
9 | गौर | भोगदवार डब्ल्यूएसएस इनटेक पॉइंट के पास, जबलपुर | V |
10 | कालियासोत | रोड ब्रिज के पास, मंडीदीप | V |
11 | मंदाकिनी | चित्रकूट | V |
12 | नर्मदा | हनुमानतिया, खंडवा | IV |
13 | सिंध | दतिया | V |
14 | वर्धा | बंगांव गांव के पास, पांढुर्ना (एमपी-महाराष्ट्र सीमा) | V |
15 | माही | बजना गांव से कदाना डैम डाउनस्ट्रीम तक | V |
16 | पार्वती | विंध्याचल नाला से इनटेक पॉइंट, पिल्लूखेड़ी, राजगढ़ तक | V |
17 | ताप्ती | हातनूर | V |
18 | टोंस | माधवगढ़ से पीएचईडी डब्ल्यूएस इनटेक पॉइंट, सतना के पास तक | V |
स्रोत: सीपीसीबी, टेबल 3.16
रिपोर्ट के इन्हीं आंकड़ों को आधार बनाकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की सेंट्रल जोन बेंच ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति श्यो कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की बेंच ने तीनों राज्यों से चार हफ्ते के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। यह जवाब पर्यावरण सचिवों, नगरीय विकास विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को संयुक्त रूप से देना होगा, जिसमें शहरों में पानी की खपत, सीवेज उत्पादन, चालू एसटीपी और लंबित परियोजनाओं का पूरा ब्यौरा शामिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।
चंबल भी उसी श्रेणी में, बेतवा और कालियासोत पर भी चेतावनी
खान अकेली नदी नहीं जो इस सूची में सबसे ऊपर है। नागदा के पास चंबल नदी को भी प्राथमिकता श्रेणी-1 में रखा गया है, यानी वहां का पानी भी उतना ही जहरीला है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस पानी के सीधे संपर्क में आने से त्वचा के गंभीर रोग हो सकते हैं। भोपाल के पास कालियासोत और विदिशा में बेतवा नदी में सीधे गिर रहे सीवेज को भी जल संकट और बीमारियों की बड़ी वजह बताया गया है।
72 प्रतिशत सीवेज बिना ट्रीटमेंट सीधे नदियों में
रिपोर्ट के मुताबिक देश में रोजाना 72,368 मिलियन लीटर (एमएलडी) सीवेज पैदा होता है, जिसमें से सिर्फ 28 प्रतिशत यानी 20,236 एमएलडी का ही एसटीपी के जरिए ट्रीटमेंट हो पाता है। बाकी 72 प्रतिशत सीवेज और कारखानों का रासायनिक कचरा बिना किसी शोधन के सीधे नदियों, झीलों और भूजल में मिल रहा है।
मध्य प्रदेश की तस्वीर भी उतनी ही खराब है। प्रदेश के शहरी इलाकों में रोजाना करीब 2,183.7 एमएलडी सीवेज पैदा होता है, जबकि राज्य के पास कुल 1,311.99 एमएलडी क्षमता के ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मौजूद हैं। इनमें से भी कई प्लांट या तो बंद पड़े हैं या रखरखाव की कमी झेल रहे हैं, नतीजा यह कि सिर्फ 696.03 एमएलडी सीवेज, यानी कुल उत्पादन का आधे से भी कम हिस्सा, ट्रीट हो पाता है। सुनवाई के दौरान एनजीटी को यह भी बताया गया कि अमृत-2.0 योजना के तहत राज्य में 7,166.93 किलोमीटर सीवर लाइन बिछाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन इस काम की रफ्तार बेहद धीमी है।
स्वच्छ भारत मिशन के आंकड़े इस लापरवाही की और तस्दीक करते हैं। मध्य प्रदेश में अभी सिर्फ एक-चौथाई घर ही सीवर नेटवर्क से जुड़े हैं, यानी करीब 10.5 लाख घर। बाकी 29.9 लाख से ज्यादा घर आज भी सेप्टिक टैंक पर निर्भर हैं। नगरीय निकायों द्वारा 2018 के मैनुअल का पालन न करना इस संकट को और गहरा कर रहा है।
एनजीटी ने गिनाईं लापरवाही की वजहें
सुनवाई के दौरान बेंच ने नगरीय निकायों के सीवेज प्रबंधन पर सीधे सवाल उठाए। बेंच ने चार बड़ी वजहें गिनाईं: अमानक सेप्टिक टैंकों का निर्माण, सीवर लाइनों को बिना एसटीपी से जोड़े सीधे ड्रेनेज नालों में मिलाना, एसटीपी चलाने के लिए कुशल तकनीशियनों की कमी, और सीवेज प्रबंधन के लिए फंड का अभाव।
कलेक्टर और निगमायुक्त की जवाबदेही तय
एनजीटी ने इस बार सीधे जिला कलेक्टरों और नगर निगम आयुक्तों की जवाबदेही तय कर दी है। बेंच के आदेश के मुताबिक अब सेप्टिक टैंक साफ करने वाले सभी टैंकरों और वाहनों का नगरीय निकायों में अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होगा, और उनमें जीपीएस ट्रैकर लगाना होगा ताकि नदियों या खुले में सीवेज बहाने वालों पर नकेल कसी जा सके। इसके अलावा शहरों की अनाधिकृत बस्तियों की जीआईएस मैपिंग करने, मौजूद एसटीपी की पूरी क्षमता का इस्तेमाल सुनिश्चित करने, और उपचारित पानी को उद्योगों व निर्माण कार्यों में दोबारा इस्तेमाल करने के लिए ठोस नीति बनाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
टेम्स की तर्ज पर पुनर्जीवित करने का दावा, हकीकत में अरबों रुपए बहे
करीब ढाई-तीन दशक पहले नगर निगम और स्थानीय प्रशासन ने खान नदी को लंदन की टेम्स नदी की तर्ज पर पुनर्जीवित करने का दावा किया था। इसके लिए 2,100 करोड़ रुपए के साथ 250 करोड़ रुपए का बांड भी लाया गया था। यानी कुल मिलाकर अरबों रुपए खर्च होने के बावजूद यह दावा आज भी हवा-हवाई ही साबित हुआ है। शहर के हाथीपाला इलाके से गुजरने वाली इसी नदी में कभी हाथी स्नान किया करते थे, इसका पानी इतना शुद्ध और शीतल था कि पेयजल के तौर पर इस्तेमाल होता था। आज यह महज एक गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है।
नदी को साफ करने के लिए जनभागीदारी के जरिए भी करोड़ों रुपए जुटाए गए, लेकिन यह रकम कहां खर्च हुई इसका कोई हिसाब सामने नहीं आया। स्मार्ट सिटी, नमामि गंगे और अमृत प्रोजेक्ट के तहत अब तक 1,200 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, फिर भी खान नदी की गंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ा।
जब आईडीए में पंडित कृपाशंकर शुक्ला अध्यक्ष थे, तब उन्होंने खान नदी को साफ करने का बीड़ा उठाया था। भारी मात्रा में गाद निकाली गई, नाव चलाने की योजना बनी और दिखावे के तौर पर नाव चली भी, लेकिन जल्द ही यह योजना फिर गंदगी में धंस गई। जिला प्रशासन, नगर निगम और आईडीए मिलकर अब तक कुल 2,100 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर चुके हैं, बांड और जनभागीदारी की रकम अलग से। नतीजा वही ढाक के तीन पात, खान नदी आज भी मैली की मैली है।

