
मुंबई की इस 102 साल पुरानी इमारत से चलता है Tata का साम्राज्य! ‘Bombay House’ में ऐसा क्या है जो इसे बनाता है बेहद खास?
मुंबई के फोर्ट इलाके की होमी मोदी स्ट्रीट पर खड़ा बॉम्बे हाउस सिर्फ टाटा समूह का मुख्यालय नहीं, बल्कि भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की एक सदी से भी पुरानी विरासत है। 1924 में तैयार हुई इस इमारत को गेटवे ऑफ इंडिया के वास्तुकार जॉर्ज विटेट ने डिजाइन किया था। इसकी कहानी कारोबार के साथ एक ऐसी परंपरा से भी जुड़ी है, जिसमें बेसहारा कुत्तों के लिए भी दरवाजे खुले रहे।

Audio tools for this article
मुंबई। बाहर से देखें तो दक्षिण मुंबई के फोर्ट इलाके में खड़ी पत्थरों की यह इमारत आसपास की दूसरी हेरिटेज बिल्डिंग जैसी दिखाई देती है। न कोई आसमान छूता ग्लास टावर, न विशाल कॉरपोरेट कैंपस। लेकिन होमी मोदी स्ट्रीट की इसी इमारत के भीतर टाटा समूह के इतिहास के कई बड़े कारोबारी अध्याय लिखे गए हैं। नाम है—बॉम्बे हाउस।
एक सदी से ज्यादा पुरानी यह इमारत टाटा समूह की पहचान के साथ इतनी गहराई से जुड़ी है कि इसे केवल ‘हेडक्वार्टर’ कहना इसकी कहानी को छोटा कर देता है।
1924 में तैयार हुआ वह घर, जो Tata की पहचान बन गया
बॉम्बे हाउस का निर्माण 1924 में पूरा हुआ था। इससे पहले टाटा समूह का कामकाज मुंबई की नवसारी बिल्डिंग से संचालित होता था। कारोबार का दायरा बढ़ा तो सर दोराबजी टाटा के दौर में एक ऐसे मुख्यालय की जरूरत महसूस हुई, जहां समूह की प्रमुख गतिविधियों को एक जगह लाया जा सके।
इसी जरूरत से बॉम्बे हाउस अस्तित्व में आया और धीरे-धीरे यह टाटा समूह के कॉरपोरेट इतिहास का स्थायी पता बन गया।
इसे बनाने वाले वास्तुकार ने ही डिजाइन किया था Gateway of India
बॉम्बे हाउस की कहानी में एक और बड़ा नाम जुड़ा है—जॉर्ज विटेट।
स्कॉटिश मूल के वास्तुकार विटेट का मुंबई की स्थापत्य पहचान पर गहरा प्रभाव रहा। गेटवे ऑफ इंडिया और तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम जैसी ऐतिहासिक इमारतों से भी उनका नाम जुड़ा है।
बॉम्बे हाउस के डिजाइन में भी उसी दौर की स्थापत्य छाप दिखाई देती है। इसके निर्माण में मुंबई क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले मजबूत स्थानीय पत्थर का उपयोग किया गया, जिसने करीब एक सदी बाद भी इमारत की विशिष्ट पहचान कायम रखी है।
चार दीवारों के भीतर लिखे गए अरबों के कारोबारी फैसले
बॉम्बे हाउस का महत्व उसकी उम्र से कहीं बड़ा है। यह लंबे समय से टाटा समूह की प्रमुख कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व और केंद्रीय कॉरपोरेट गतिविधियों का केंद्र रहा है।
टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और समूह की दूसरी बड़ी कंपनियों से जुड़े शीर्ष स्तर के रणनीतिक फैसलों का इतिहास इस पते से जुड़ा रहा है।
टाटा का कारोबार नमक और चाय से लेकर कार, स्टील, सॉफ्टवेयर, होटल और विमानन तक पहुंच गया, लेकिन समूह की ऐतिहासिक कॉरपोरेट पहचान का पता बॉम्बे हाउस ही बना रहा।
94 साल बाद पहली बार बदला अंदर का चेहरा
इतिहास संभालना था, लेकिन इमारत को आधुनिक दौर के लिए तैयार भी करना था। 2018 में एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में बॉम्बे हाउस का बड़े स्तर पर नवीनीकरण किया गया।
खास बात यह रही कि आधुनिक कार्यस्थल की जरूरतों के हिसाब से अंदर बदलाव किए गए, लेकिन इमारत के ऐतिहासिक चरित्र को बचाए रखने पर जोर दिया गया।
यानी बाहर वही पुराना बॉम्बे हाउस और अंदर नए दौर के टाटा के मुताबिक कार्यस्थल।
कॉरपोरेट मुख्यालय में आवारा कुत्तों के लिए भी एक कमरा
इस इमारत की सबसे अलग कहानी बोर्डरूम में नहीं, बल्कि उन बेसहारा कुत्तों से जुड़ी है जिन्हें वर्षों से यहां आश्रय मिलता रहा है।
बॉम्बे हाउस में आसपास घूमने वाले कुत्तों को अंदर आने देने की परंपरा लंबे समय से रही है। इसे जेआरडी टाटा के दौर से जोड़ा जाता है और रतन टाटा के पशु प्रेम के कारण यह परंपरा आगे भी मजबूत हुई।
2018 के नवीनीकरण में उनके लिए बाकायदा एक अलग स्थान तैयार किया गया, जहां उनके आराम, पानी और भोजन जैसी जरूरतों का ध्यान रखा जा सके।
यही छोटी-सी बात बॉम्बे हाउस को किसी सामान्य कॉरपोरेट मुख्यालय से अलग पहचान देती है।
ऊंची इमारत नहीं, फिर भी भारतीय कॉरपोरेट जगत का बड़ा पता
आज दुनिया की बड़ी कंपनियां अपने विशाल ग्लास टावर और हाईटेक कैंपस के लिए जानी जाती हैं। टाटा समूह के पास भी आधुनिक कार्यालयों की कमी नहीं है। फिर भी 1924 की यह इमारत अपनी जगह कायम है।
क्योंकि बॉम्बे हाउस की कीमत उसकी जमीन या पत्थरों से तय नहीं होती। इसके कमरों ने जेआरडी टाटा से रतन टाटा और फिर एन. चंद्रशेखरन तक समूह के कई दौर देखे हैं।
इसने टाटा को एक भारतीय कारोबारी घराने से वैश्विक समूह बनते देखा। कंपनियां बदलीं, कारोबार बढ़ा, नेतृत्व की पीढ़ियां बदलीं—लेकिन मुंबई की होमी मोदी स्ट्रीट का यह पता टाटा की कहानी में बना रहा।
इसीलिए Bombay House सिर्फ Tata का ऑफिस नहीं, उसकी कॉरपोरेट विरासत का ‘घर’ है।




