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₹22,000 करोड़ का कर्ज, चुकाने होंगे सिर्फ ₹6.5 करोड़! NCLT के फैसले से मचा बवाल, जानिए सुभाष चंद्रा को कैसे मिली इतनी बड़ी राहत
NCLT ने सुभाष चंद्रा से जुड़े भारी-भरकम कर्ज दावे के सेटलमेंट प्लान को मंजूरी दी है।लोकस्वामी ग्राफिक्स
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₹22,000 करोड़ का कर्ज, चुकाने होंगे सिर्फ ₹6.5 करोड़! NCLT के फैसले से मचा बवाल, जानिए सुभाष चंद्रा को कैसे मिली इतनी बड़ी राहत

Digital News Desk4 min read27/08/26

एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़े करीब ₹22,006 करोड़ के कर्ज मामले में NCLT ने ₹6.5 करोड़ के सेटलमेंट प्लान को मंजूरी दी है। फैसले के बाद बैंकिंग सिस्टम, IBC और कर्ज वसूली की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है।

Lokswami AI

नई दिल्ली। कल्पना कीजिए, किसी पर 22 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज हो और उस पूरे मामले को महज 6.5 करोड़ रुपये में निपटाने की मंजूरी मिल जाए। यही वजह है कि सुभाष चंद्रा से जुड़े इस मामले ने बैंकिंग और कॉर्पोरेट जगत में हलचल पैदा कर दी है। NCLT ने एस्सेल ग्रुप से जुड़े कर्ज मामले में उनके पर्सनल गारंटी से जुड़े दावों के लिए 6.5 करोड़ रुपये के रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है।

मामले में कुल दावा करीब ₹22,006.57 करोड़ का बताया गया है। ऐसे में मंजूर रकम मूल दावे का बेहद छोटा हिस्सा है। इसी वजह से यह मामला अब सिर्फ एक कारोबारी कर्ज का नहीं, बल्कि यह सवाल भी बन गया है कि बड़े कर्ज मामलों में बैंकों को आखिर कितनी रकम वापस मिल पाती है।

22 हजार करोड़ के सामने 6.5 करोड़, इतना बड़ा फर्क क्यों?

यहां सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यह रकम सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिया गया पूरा 22 हजार करोड़ रुपये का कर्ज नहीं है। मामला उनकी पर्सनल गारंटी से जुड़ा है।

एस्सेल ग्रुप की कंपनियों को दिए गए कर्ज के लिए सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी। जब संबंधित कंपनियां अपने कर्ज का भुगतान नहीं कर सकीं, तो गारंटी के आधार पर उनके खिलाफ भी दावा सामने आया।

NCLT के सामने इसी व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े मामले में रिपेमेंट प्लान रखा गया था, जिसे ट्रिब्यूनल ने मंजूरी दे दी।

‘100 रुपये के कर्ज पर करीब 3 पैसे’ वाली तस्वीर क्यों चर्चा में है?

22,006 करोड़ रुपये के दावे के मुकाबले 6.5 करोड़ रुपये की मंजूर रकम बेहद छोटी है। मोटे तौर पर देखें तो हर 100 रुपये के दावे के मुकाबले करीब 3 पैसे की रकम बैठती है।

यही आंकड़ा इस पूरे मामले को इतना चौंकाने वाला बनाता है और सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक बहस तक में इसकी चर्चा हो रही है।

हालांकि इसे सीधे तौर पर सामान्य अर्थों में ‘कर्ज माफी’ कहना सही नहीं होगा। यह इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के तहत पर्सनल गारंटी से जुड़े दावे का सेटलमेंट प्लान है।

NCLT ने आखिर प्लान को मंजूरी क्यों दी?

ट्रिब्यूनल के सामने मुख्य सवाल यह था कि उपलब्ध परिस्थितियों में लेनदारों को कितना पैसा मिल सकता है।

NCLT के मुताबिक, रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के आकलन में सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्तियों का मूल्य प्रस्तावित रकम से अधिक नहीं पाया गया। ऐसे में अगर प्लान खारिज होता और उन्हें दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती, तो लेनदारों को संभवतः इससे भी कम रकम मिलती।

इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने प्लान को मंजूरी दी।

अब तय प्रक्रिया के तहत 6.5 करोड़ रुपये को पात्र लेनदारों के बीच नियमों के अनुसार बांटा जाएगा।

कांग्रेस ने उठाया बैंकिंग सिस्टम पर सवाल

फैसले के बाद कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार और इंसॉल्वेंसी व्यवस्था पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल उठाया कि IBC का उद्देश्य बैंकों के फंसे हुए पैसे की वसूली करना था, लेकिन अगर हजारों करोड़ के दावे के मुकाबले इतनी कम रकम मिलती है तो इसे लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उन्होंने इस मामले को ‘हेयरकट’ से आगे का मामला बताते हुए तीखी राजनीतिक टिप्पणी की।

विजय माल्या ने भी फैसले पर कसा तंज

इस मामले पर कारोबारी विजय माल्या की प्रतिक्रिया ने भी चर्चा बढ़ा दी। माल्या ने अपने ऊपर घोषित कर्ज और अब तक हुई कथित वसूली का हवाला देते हुए सुभाष चंद्रा के मामले पर तंज किया।

उनकी टिप्पणी का सार यही था कि एक तरफ हजारों करोड़ रुपये के दावे के मुकाबले बेहद कम रकम पर मामला सुलझ रहा है, जबकि उनके मामले में बड़ी रकम की वसूली का दावा किया जाता रहा है।

‘हेयरकट’ का मतलब क्या होता है?

बैंकिंग और इंसॉल्वेंसी की भाषा में हेयरकट का मतलब है कि लेनदार अपने कुल बकाए की पूरी रकम वसूल नहीं कर पाता और उसे कम रकम स्वीकार करनी पड़ती है।

उदाहरण के लिए, अगर किसी बैंक का 100 रुपये बकाया है और उसे 40 रुपये ही वापस मिलते हैं, तो बाकी 60 रुपये का हिस्सा हेयरकट कहलाएगा।

इस मामले में 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के दावे और 6.5 करोड़ रुपये के सेटलमेंट के बीच का अंतर बेहद बड़ा है।

अब आगे क्या होगा?

NCLT की मंजूरी के बाद अब रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल लेनदारों की अंतिम सूची तैयार करेगा। इसके बाद मंजूर 6.5 करोड़ रुपये की रकम नियमों के मुताबिक संबंधित लेनदारों में बांटी जाएगी।

यानी मामला यहीं खत्म नहीं होता। अब असली सवाल यह है कि किन लेनदारों का दावा स्वीकार किया जाएगा और उनके हिस्से में कितनी रकम आएगी।

एक फैसले ने खड़े कर दिए कई बड़े सवाल

सुभाष चंद्रा का यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें कर्ज की राशि और मंजूर सेटलमेंट रकम के बीच जमीन-आसमान का अंतर है।

NCLT ने अपने आदेश में उपलब्ध संपत्तियों और भविष्य में वसूली की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्लान को मंजूरी दी है। लेकिन दूसरी ओर, इतने बड़े दावे के मुकाबले इतनी कम रकम की वसूली ने बैंकिंग सिस्टम और IBC की प्रभावशीलता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

22 हजार करोड़ का दावा और सिर्फ 6.5 करोड़ का सेटलमेंट—अब इस फैसले पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह वसूली की मजबूरी थी या इंसॉल्वेंसी कानून की प्रक्रिया का परिणाम?

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