
एक मैदान, बीच में दीवार और दो कारोबारी घराने... कैसे बजाज-फिरोदिया की दोस्ती बन गई भारत की सबसे लंबी कॉरपोरेट जंग?
कभी नवल फिरोदिया बजाज ऑटो में राहुल बजाज के बॉस थे और दोनों परिवारों के कारोबारी रिश्ते बेहद करीबी थे। फिर शेयर खरीदने की एक चाल ने भरोसा तोड़ा। 1968 में रास्ते अलग हुए, लेकिन लड़ाई खत्म नहीं हुई—शेयर बाजार, बोर्डरूम, अदालत और टेकओवर की कोशिशों तक पहुंची यह जंग दशकों चली।

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नई दिल्ली। पुणे के आकुर्डी में दो औद्योगिक परिसरों के बीच खड़ी एक दीवार सिर्फ जमीन का बंटवारा नहीं बताती। इसके पीछे भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की ऐसी कहानी छिपी है, जिसमें दोस्ती है, साझेदारी है, शेयरों की गुपचुप खरीद है, करोड़ों का दांव है और एक-दूसरे की कंपनी पर प्रभाव बनाए रखने की दशकों लंबी कोशिश भी। एक तरफ राहुल बजाज का बजाज परिवार, दूसरी तरफ नवल के. फिरोदिया का परिवार, जिसकी बजाज टेंपो आगे चलकर फोर्स मोटर्स बनी। दिलचस्प यह है कि कहानी दुश्मनी से नहीं, गहरे भरोसे से शुरू हुई थी।
जब नवल फिरोदिया बजाज परिवार के साथ ₹500 महीने पर काम करते थे
नवल के. फिरोदिया मूल रूप से अहमदनगर के वकील और गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे। स्वतंत्रता आंदोलन से उनका जुड़ाव रहा और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें यरवदा जेल भी जाना पड़ा।
बजाज परिवार से उनका रिश्ता इससे भी पुराना था। कांग्रेस से जुड़ी गतिविधियों के दौरान उनका संपर्क जमनालाल बजाज से हुआ। आजादी के बाद वे बजाज समूह से जुड़े और एक दौर में बछराज ट्रेडिंग में करीब ₹500 मासिक वेतन पर काम किया।
यहीं से रिश्ता कर्मचारी और मालिक से आगे बढ़कर कारोबारी साझेदारी में बदलने लगा।
1957 में खड़ी हुई बजाज टेंपो, फिरोदिया बने अहम चेहरा
भारत में स्कूटर और थ्री-व्हीलर उद्योग आकार ले रहा था। विदेशी तकनीक और भारतीय कारोबारी साझेदारी के इसी दौर में अगस्त 1957 में बजाज टेंपो अस्तित्व में आई। नवल फिरोदिया इसकी स्थापना और विस्तार के महत्वपूर्ण चेहरों में थे।
दूसरी ओर बजाज ऑटो भी तेजी से आगे बढ़ रही थी। बाद में दोनों कंपनियों की उत्पादन इकाइयां पुणे के आकुर्डी क्षेत्र में पहुंचीं। कारोबार पास था, परिवार पास थे और आपसी आवाजाही इतनी सहज थी कि शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कुछ वर्षों बाद यही जमीन दोनों घरानों की दूरी की निशानी बनेगी।
राहुल बजाज आए... और उनके बॉस थे नवल फिरोदिया
कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ राहुल बजाज की कारोबारी एंट्री के साथ आता है। उन्होंने डिप्टी जनरल मैनेजर के रूप में काम शुरू किया। खरीद, बिक्री, मार्केटिंग, फाइनेंस और ऑडिट जैसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक काम उनके पास थे।
और उस समय उनके वरिष्ठ कौन थे?
नवल के. फिरोदिया।
वही फिरोदिया जिनके परिवार से आगे चलकर बजाज परिवार की सबसे चर्चित कारोबारी लड़ाइयों में से एक होने वाली थी।
फिर बाजार से खरीदे जाने लगे बजाज ऑटो के शेयर
1960 के दशक के आखिर में रिश्तों की दिशा बदलने लगी। फिरोदिया परिवार ने बाजार से बजाज ऑटो के शेयर खरीदकर अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी शुरू की। राहुल बजाज को जब इसकी जानकारी हुई तो शेयर ट्रांसफर को लेकर टकराव पैदा हुआ।
यह विवाद केवल कुछ शेयरों का नहीं था। सवाल था—बजाज ऑटो पर भविष्य में वास्तविक नियंत्रण किसका रहेगा?
फरवरी 1968 तक फिरोदिया पक्ष की हिस्सेदारी करीब 23% तक पहुंच गई थी। दूसरी तरफ बजाज परिवार भी पीछे हटने वाला नहीं था और उसने अपनी हिस्सेदारी मजबूत करनी शुरू कर दी।
दो पुराने सहयोगी अब एक ही कंपनी में प्रभाव की लड़ाई लड़ रहे थे।
सितंबर 1968: दोस्ती टूटी, कंपनियां बंटीं
आखिरकार सितंबर 1968 में कारोबारी रिश्ते निर्णायक मोड़ पर पहुंच गए। राहुल बजाज ने बजाज टेंपो से इस्तीफा दिया और नवल फिरोदिया बजाज ऑटो से अलग हो गए।
बजाज ऑटो बजाज परिवार के नियंत्रण में रही, जबकि बजाज टेंपो फिरोदिया परिवार के पास चली गई। यही कंपनी वर्षों बाद फोर्स मोटर्स के नाम से पहचानी गई।
कागज पर बंटवारा हो चुका था। असली लड़ाई मगर इसके बाद शुरू हुई।
₹260 का शेयर और राहुल बजाज की ₹411 वाली बोली
दोनों पक्षों के बीच हिस्सेदारी की लड़ाई का सबसे चर्चित अध्याय वित्तीय संस्थानों के पास मौजूद लगभग 4% शेयरों की नीलामी बनी।
उस समय शेयर का बाजार भाव करीब ₹260 बताया जाता है। फिरोदिया पक्ष ने ₹262.50 प्रति शेयर की बोली लगाई।
राहुल बजाज ने जवाब में सीधे ₹411 प्रति शेयर की पेशकश कर दी।
बाजार मूल्य से इतनी ऊंची बोली का अर्थ केवल निवेश पर रिटर्न नहीं था। नियंत्रण की इस लड़ाई में हिस्सेदारी की रणनीतिक कीमत बाजार भाव से कहीं ज्यादा हो चुकी थी।
लड़ाई अदालत तक पहुंची
शेयर ट्रांसफर को लेकर दोनों पक्षों का विवाद न्यायपालिका तक पहुंचा। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और फिरोदिया पक्ष को वहां अपेक्षित राहत नहीं मिली।
लेकिन कानूनी लड़ाई खत्म होने का मतलब कारोबारी तनाव खत्म होना नहीं था। दोनों परिवार एक-दूसरे की कंपनियों में ऐसी हिस्सेदारी लिए बैठे थे, जो महत्वपूर्ण फैसलों पर असर डाल सकती थी।
यानी कंपनियां अलग थीं, लेकिन शेयरों ने दोनों को एक-दूसरे से बांध रखा था।
फिर कॉरपोरेट लड़ाई सार्वजनिक तंज तक पहुंची
1980 के दशक तक बंद कमरों का विवाद सार्वजनिक बयानों में भी दिखाई देने लगा। राहुल बजाज ने एक इंटरव्यू में भविष्य में बजाज टेंपो के फिर से अविभाजित बजाज समूह का हिस्सा बनने की उम्मीद जताई।
फिरोदिया पक्ष का जवाब भी उतना ही तीखा था। प्रतिक्रिया में उस मशहूर कहावत का सहारा लिया गया जिसका भाव था—कौवे के कोसने से बैल नहीं मरता।
अब यह केवल बैलेंस शीट और शेयर सर्टिफिकेट का विवाद नहीं रहा था। दोनों परिवारों की प्रतिस्पर्धा सार्वजनिक कॉरपोरेट प्रतिद्वंद्विता बन चुकी थी।
90 के दशक में खेल पलटा, बजाज टेंपो में तीन पक्षों के पास 26-26%
1990 के दशक में शेयरों की बिसात एक बार फिर बदली। विस्तार के लिए पूंजी की जरूरत के बीच फिरोदिया परिवार ने बजाज ऑटो में अपनी कुछ हिस्सेदारी बेची और वहां उसकी पकड़ कमजोर हुई।
इसी दौरान बजाज टेंपो में भी हिस्सेदारी का समीकरण बदल रहा था।
1991-92 के आसपास स्थिति ऐसी बनी कि फिरोदिया परिवार, बजाज और जर्मन कंपनी डैमलर-बेंज—तीनों के पास करीब 26-26% हिस्सेदारी थी। शेष लगभग 22% शेयर सार्वजनिक निवेशकों के पास थे।
यह बेहद असामान्य स्थिति थी। जिस कंपनी से राहुल बजाज दशकों पहले अलग हो चुके थे, उसी में उनकी हिस्सेदारी इतनी थी कि महत्वपूर्ण कॉरपोरेट फैसलों पर उनका प्रभाव बना रह सकता था।
कंपनी खरीद नहीं पाए तो 26% शेयर क्यों संभालकर रखे?
आगे चलकर फिरोदिया परिवार ने बजाज टेंपो पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। 1995 के आसपास समीकरण बदलकर फिरोदिया के पक्ष में जाने लगा और कंपनी के टेकओवर की संभावना कमजोर पड़ गई।
इसके बावजूद बजाज पक्ष अपनी बड़ी हिस्सेदारी से तुरंत बाहर नहीं निकला।
राहुल बजाज से जब इसका कारण पूछा गया तो उनका रुख दिलचस्प था—उनके मुताबिक कंपनी अच्छी चल रही थी और हिस्सेदारी एक अच्छा निवेश थी, जिसे बेचने पर अच्छा रिटर्न मिल सकता था।
लेकिन कारोबारी गणित में उस हिस्सेदारी की एक दूसरी ताकत भी थी—इतनी बड़ी हिस्सेदारी महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर प्रभाव डाल सकती थी।
और फिर आकुर्डी के मैदान में खड़ी हो गई दीवार
जिस जगह दोनों कंपनियों के लोग कभी सहजता से एक-दूसरे के यहां चले जाते थे, वहीं समय के साथ भौतिक सीमा खड़ी हो गई।
इसलिए आकुर्डी की वह दीवार इस कहानी का सबसे प्रभावी प्रतीक बन गई—कभी साथ कारोबार खड़ा करने वाले दो परिवार आखिर इतने दूर हुए कि जमीन के बीच भी सीमा खींच गई।
बजाज ऑटो आगे चलकर भारत के सबसे बड़े दोपहिया और तिपहिया वाहन निर्माताओं में शामिल हुई। बजाज टेंपो ने भी अपनी अलग राह बनाई और बाद में फोर्स मोटर्स बनी।
कारोबार दोनों ने बनाया, लेकिन उनकी टूटी साझेदारी भारतीय उद्योग जगत को एक ऐसी कहानी दे गई जिसमें कभी कर्मचारी रहे व्यक्ति के परिवार और मालिक परिवार के बीच शुरू हुई हिस्सेदारी की लड़ाई कई दशकों तक कॉरपोरेट इतिहास का हिस्सा बनी रही।



