नादिरशाह कलंकी नाथ्या की कटी नाक के बाल सज्जनसिंह की दुर्जन जुबां...“तेरे बाप का कार्यक्रम नहीं!”
राहुल गांधी के कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ में डीसीपी नरेंद्र रावत को पूर्व मंत्री सज्जनसिंह के कहे ‘तेरे बाप का कार्यक्रम नहीं है’ पर लोकस्वामी का सीधा सवाल: क्या राजनीतिक कार्यक्रम किसी नेता की निजी जागीर है और खाकी का काम सियासतदां के इशारों पर चलना है?

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तेरे बाप का कार्यक्रम नहीं है...
खादी की गर्मी से खाकी के लिए निकले ये अल्फ़ाज महज एक तंज नहीं हैं... ये उस जहनियत का आईना हैं, जिसमें नेता कार्यक्रम को अपना सियासी अखाड़ा और सरकारी मशीनरी को अपनी सुविधा का औजार समझने लगते हैं... राजनीति में बाहें चढ़ाकर टपोरी भाषा का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं... खद्दरधारियों की गंदी जुबान कई बार मंच से फिसलकर सड़क तक आ जाती है... हाल ही राहुल गांधी के कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ में इसकी जिंदा मिसाल देखी गई... जबरदस्त भीड़ से जोशीले ‘भिडुओं’ का दिमाग सीधे सातवें आसमान जा पहुंचा... दिन के उजाले में ही हुकूमत के ख्वाब हिचकोले खाने लगे, नतीजन कलंकी नाथ्या की कटी नाक का बाल पूर्व मंत्री सज्जनसिंह की दुर्जनता जोर पकड़ गई... मौका-ए-वारदात पर इंतजाम की कमान संभाले आईपीएस ऑफिसर डीसीपी नरेंद्र रावत को नत्थी बक बैठे ‘तेरे बाप का कार्यक्रम नहीं है, राहुल गांधी का कार्यक्रम है’ जिसे महज तकरार मानकर टाल देना उचित नहीं होगा... क्योंकि सवाल बिगड़े बोल से बड़ा है... क्या राजनीतिक कार्यक्रम किसी नेता की निजी जागीर है...? अगर नहीं... तो फिर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को यह बताने की जरूरत क्यों पड़ी, कि कार्यक्रम किसका है...? बेशक कार्यक्रम सज्जन सिंह के नेता राहुल गांधी का है तो क्या उसके सुरक्षा इंतजाम, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी किसी कांग्रेसियों के दिशा-निर्देश पर चलेंगी...? खाकी का काम हिफाजत करना है, सियासतदां के इशारों पर फर्ज निर्वाह करना नहीं...
जबकि पंडाल में करीबन १५ छात्र-छात्राएं बेहोश हो गए थे... जबरदस्त भीड़ के बीच कई युवा परेशान... छात्रों की गूंज ‘कांग्रेसी सिस्टम’ की चूक से चीख में बदल गई थी... भीड़ यदि ज्यादा थी तो उसकी सुचारू व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी कांग्रेसियों की थी... अफसोस बतौर आयोजक कांग्रेसी अपने फर्ज को नजरअंदाज कर गए... ऐसे में एक आला अफसर ने अगर मौके की नजाकत को भांप भीड़ को नियंत्रित करने की गरज से माइक मांग लिया तो आपने उन्हें भी सियासी चश्मे से देख लिया... यदि कोई भीड़ में कुचल जाता, तो कैंची की तरह दुर्जन जुबां चलाकर खाकी पर स्याह दाग लगा देते...

‘पहलवान’ सज्जनसिंह ये क्यों भूल गए कि उनके आका नादिरशाह-कलंकी नाथ्या ने हुकूमत के मद में खुद की चमड़ी और उनके चमड़ीखोर नौकरशाहों को बचाने हेतु पुलिस और प्रशासनिक मशीनरीज का किस कदर दुरुपयोग किया था ... मधुमक्खी के छत्ते से निकली ‘श्वेत सच्चाई’ को ढांकने के लिए लोकस्वामी परिवार पर जुल्म-ओ-ज्यादती का ऐसा नंगा नाच किया, जिसकी दूसरी बानगी हिंदुस्तान तो क्या दुनिया के किसी भी लोकशाही मुल्क में नहीं देखी गई, ना ही आने वाले वक्त में भी शायद ही मुमकिन हो... बावजूद इसके, आप शायद आपातकाल के काले दिनों की स्याह यादें भूल गए... नेता आप भले मेरी तल्ख टिप्पणी से आहत हों... लेकिन झूठ को सच्चाई का जामा पहनाया नहीं जा सकता... आप तो सज्जन हैं, हमारे अपने हैं, मां अहिल्या की गोद में पले-बढ़े हैं, फिर कैसे एक आईपीएस के लिए दुर्जनता झलक उठी... छात्र राजनीति से उठकर मंत्री की कुर्सी तक का सफर करने वाले मेरे वरिष्ठ से सीधा सवाल यही, कि जब नेता पुलिस को राजनीतिक चश्मे से देखने लगे और पुलिस नेता को राजनीतिक दबाव के चश्मे से देखने लगे, तब कानून-व्यवस्था किसके हाथ में बचेगी...? इंदौर की जनता यह मंजर देख अचंभे में है, उसे न खाकी की दबंगई चाहिए, न खादी की मदमस्ती... उसे तो चाहिए ‘संविधान की मर्यादा’... नेताजी कुर्सी मंत्री की हो या आईपीएस की... कुर्सी बड़ी नहीं होती, देश का संविधान बड़ा होता है... जिसका राग आपके आलाकमान सड़क से लेकर संसद तक आलापते थक नहीं रहे, जिन्होंने दुनिया के सबसे बेहतरीन संविधान को इमरजेंसी नामक दीमक के हवाले कर डाला था... याद रखिए सज्जन सिंह जी! ये किसी के बाप का कार्यक्रम नहीं तो ये किसी के बाप का लोकतंत्र भी नहीं है... ये पब्लिक है, सब जानती है...


