माँ के नाम भावभीनी पाती: आपके चरणों में शत्-शत् नमन...
जयश्री कृष्णा... जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं... इसी शुभ दिन आपकी पुण्यतिथि भी है बा — लोकस्वामी के एडिटर-इन-चीफ़ जीतू सोनी की अपनी माँ को भावभीनी श्रद्धांजलि।

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श्रद्धेय बा..!
कितना अजीब संयोग है कि हम वल्लभ संप्रदाय के अनुयायी हैं और हमारे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण का आज जन्मोत्सव है ... इसी शुभ दिन आपकी पुण्यतिथि अर्थात् हम निश्चिंत है कि आपको श्रीजी के चरणों में स्थान मिला...क्योंकि, आप ताउम्र कृष्णभक्ति में लीन रहीं... फिर भी कोस रहा हूं मेरी जिंदगी की सबसे मनहूस तारीख़ 04, सितंबर 2020 को, क्योंकि इसी दिन हमने बा आपको खोया था ... 'जगविला' परिवार से बिछड़े 'बा' आपको छः बरस बीत गए, मगर दर्द-ए-दिल आज भी मेरे भीतर उतना ही ताजा है ... फर्क सिर्फ इतना है कि तब आंखों में आँसू थे और अब उन आँसुओं पीछे एक ऐसा जख्म छुपा हुआ है, जिसे लफ्जों में बयां करना मुश्किल है...क्योंकि बा !, आपको मैंने अपनी आंखों के सामने नहीं खोया ... कितना बदकिस्मत 'दीकरा' हूं, जिसने आपको जेल की सलाखों के पीछे रहते खोया...
सच्ची पत्रकारिता का धर्म
जिन जुल्मियों की हक़ीक़त मैं बेख़ौफ़ होकर दुनिया के सामने लाने की कोशिश कर रहा था, उन बहुरूपियों के चेहरों पर चढ़ी नक़ाब नोंच सच्ची पत्रकारिता के धर्म का निर्वाह कर रहा था ... उनके जुल्म-ओ-सितम का शिकार सिर्फ मैं ही नहीं, बा! आपका हर अंश हुआ ... मेरे, भाईयों, भतीजों के हिस्से जेल की दीवारें आईं और आपके हिस्से में अपने बेटों की फ़िक्र ... परिवार पर पड़ते हुक्मरान, सफ़ेदी के रंग में रंगी खाकी एवं कलयुगी लाटसाहबों के हंटरों का दर्द और वह बेबसी, जिसे एक माँ सबसे ज्यादा महसूस करती है... मैं समझ सकता हूं, कि बापू के जुदा होते ही बा आप बेहद कमजोर हो गई थीं ... यही वजह रही कि आपका शरीर शायद इन सदमों का बोझ उठाने की हालत में नहीं था, लेकिन आपका दिल तो एक ममतामयी माँ का था, वह अपने बेटों और अपने परिवार पर होने वाले हर दुख को अपने भीतर समेटता रहा... नतीजन वो घड़ी भी आ गई, जिसकी कल्पना सपने में भी हम में से किसी ने नहीं की थी ...
अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाया
बा! आप तो बैकुण्ठधाम प्रस्थान कर गई और मैं अभागा आपके अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाया .... यह पीड़ा शायद मेरी जिंदगी का वो घाव है, जो नासूर बन गया है ... बा! आज भी उस बात का मलाल मेरे सीने में शिला की तरह रखा है कि जब आपकी आंखें आखिरी बार अपने जीतू को तलाश रही होंगी और मुझे अपने क़रीब नहीं पाया, क्योंकि मेरे और आपके बीच हुकूमत की हुंकार व जेल की मोटी-मोटी सलाखें थीं... मैं आपका चेहरा आखिरी बार नहीं देख सका ...न आपका कांपता हाथ पकड़ सका...न आपके माथे को चूम सका...और ना कान में यह कह सका 'बा मैं यहीं हूं।' यह गुनाह मैंने नहीं मेरी कलम से ख़ौफ़ खाये जल्लादों ने किया था, मगर इसकी सजा मुझे ताउम्र भुगतनी है... कभी-कभी तन्हाई में सोचता हूं कि काश! उस वक्त जब आपकी सांसें मेरी राह तकते-तकते दम तोड़ रही थीं, मैं आपके सिरहाने बैठा आपका हाथ पकड़कर शायद इतना ही कहता—
'बा! मुझसे नाराज मत होना। वक्त की बेरहम मार ने मुझे आपसे दूर कर दिया था।'
कृष्ण के सुदर्शन चक्र वाली सीख
बा! आपको याद है जब मैंने पहली मर्तबा कलम उठाई थी 'लोकस्वामी' अखबार के लिए, तब आपने मुझे कहा था कि 'जीतू! कृष्ण ने सुदर्शन चक्र केवल शत्रुओं के संहार के लिए नहीं उठाया था, बल्कि यह संदेश दिया था कि जब अन्याय हद पार कर जाए, तब मौन रहना भी अधर्म है...दीकरा जब तूने कलम थाम ही ली है तो कृष्ण के सुदर्शन चक्र की तरह इसका इस्तेमाल कर असत्य, अधर्म, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ तेरी कलम अनवरत चलती रहे, यही मेरा आशीष वचन है ....'
सो, आप अच्छी तरह जानती थीं कि मैंने जो रास्ता चुना, वह आसान नहीं था ... सच कहना कभी आसान नहीं होता, खासकर तब जब सच किसी ताक़तवर की भद्दी शक्ल पर चढ़ी कलाई की परतें छील रहा हो... बा! आपके सिर पर हाथ रख क़सम खा रहा हूं ख्वाबों में भी ख़याल न था, कि जंग-ए-सहाफत में सबसे बड़ी क़ीमत मुझे आपको और अपने बड़े भाई को खोकर चुकानी पड़ेगी ... जमीन-जायदाद-धन, दौलत का नुक्सान तो जीते जी पूरा हो सकता है, परंतु अपनों को खोने की भरपाई कभी नहीं हो सकती ...
"क्या मेरी लड़ाई इतनी बड़ी थी?"
आपकी तस्वीर के सामने भावभीनी पुष्पांजलि अर्पित करते हुए मन बार-बार यही सवाल कर रहा है—क्या मैं इतना ताक़तवर था, कि सरकार, प्रशासन, पुलिस एवं शहर के अख़बार माफिया, भूमाफिया, भ्रष्ट और हवसखोर नेता व नौकरशाह लामबंद हो मुझे नेस्तनाबूत करने में जुट गए..? क्या मेरी लड़ाई इतनी बड़ी थी कि उसकी कीमत एक माँ की ममता को चुकानी पड़ी..?
मेरे सवालों का जवाब वही मुस्कुराती तस्वीर देती है...' जीतू दीकरा! साचा माटे तू उभो थयो छो तो दीकरा पाछु वालु ना जो तो...' बा! आपके संस्कार, आपकी शिक्षा ही मेरी सबसे बड़ी ताक़त है...मेरा हौसला है ... आपने मुझे डरकर जीना नहीं सिखाया...ना ही नाइंसाफ़ी-जुल्म-तानाशाही के सामने सिर झुकाना... आप ही ने सबक सिखाया कि इंसान हार सकता है, लेकिन अपने जमीर से हारना नहीं चाहिए... इसीलिए बा, आपकी यादें मुझे तोड़ती नहीं अपितु मजबूत बनाती हैं ... मेरे आत्मविश्वास को फौलादी सांचे में ढाल देती हैं ...बावजूद इसके, बा! आपसे एक शिकायत बनी रहेगी – आप इतनी जल्दी क्यों हमसे अलविदा कह गई ... कम से कम मेरे लौटने का इंतजार तो किया होता... मैं जेल से बाहर आता... आपके पावन चरण छूता... आपके संग बैठ अपने सारे दु:ख-दर्द भूल जाता... और आप हमेशा की तरह मेरे सिर पर हाथ रखकर कहतीं—
'अब सब ठीक हो जाएगा जीतू, चिंता ना कर ...' अफ़सोस वो दिन कभी नहीं आया ...
माँ होने का हर फ़र्ज़ ईमानदारी से अदा किया
आपका स्मृति दिवस मेरे लिए आपको याद भर करने का दिन नहीं, यह अपने भीतर झांकने का दिन भी है कि क्या मैं आज भी उस बा की उम्मीदों के मुताबिक़ जी रहा हूं, जिसने मुझे इतना कुछ देकर विदा ली थी... सच, भाव-विभोर हो अपने मन की वह बात कह रहा हूं, जो आपकी हयाती में जीवित कभी कह नहीं पाया— बा! आपको खोने का रंज-ओ-गम आपके जीतू की हर जीत से बड़ा है... आपका आशीर्वाद मेरी हर लड़ाई में बड़ी ताक़त है ... आप जहां भी हो, मुझे और पूरे परिवार को आशीर्वाद देते रहना... बा! मुझे नहीं पता मैंने दीकरा होने का हक कितना निभाया...पर आपने माँ होने का हर फर्ज़ पूरी ईमानदारी से अदा किया।'
पहली पाठशाला, पहला सबक
बा! यक़ीन करना, हाल-फिलहाल भी मैं सच के साथ खड़ा हूं, जिसका भुगतान आपके हर अंश ने दिलेरी के साथ चुकाया ... और जिसे आप अपने बूढ़े कांधों पर उसका वजन सहते-सहते इस दुनिया से रुखसत हो गई ... आपकी स्मृति में आज आँखें जरूर नम है, किंतु सिर स्वाभिमान से ऊंचा है, क्योंकि बा! आप मेरी पहली पाठशाला रही एवं उस पाठशाला का पहला सबक यही था कि ... 'सच की राह पर अकेले चलना पड़े तो चलना, लेकिन अपने जमीर को कभी अकेला मत छोड़ना...' बा! आप भले ही जिस्मानी तौर पर हमारे साथ नहीं, परन्तु रूहानी तौर पर साये की तरह हर घड़ी साथ हैं... मुझे गर्व है कि आपने श्रीकृष्ण के संदेश 'सत्य के साथ खड़े होने का साहस, अन्याय के सामने न झुकने का संकल्प और कर्मपथ पर अडिग रहने की शक्ति' की इसी मूलमंत्र की जन्म घुटी पिलाई... उसी जन्म घुटी का परिणाम है कि आपका जीतू आपकी छत्रछाया तले गिर कर फिर उठ खड़ा हुआ और नादिरशाही, भ्रष्टाचार, बेईमानों, गुंडे-बदमाशों, भूमाफियाओं के खिलाफ पुरजोर मुहिम छेड़े हुए है...
''बा! आप तस्वीर में भले ही खामोश हो, मगर मेरी हर धड़कन में आज भी बोलती हो... दुनिया को अलविदा कह तो गई, मगर मेरी हर दुआ में आज भी मेरे साथ चलती हो।''
पुन: आपके श्रीचरणों में शत्-शत् नमन...
— जीतू सोनी, एडिटर-इन-चीफ़, लोकस्वामी

