चीनी ने छीना चैन
शक्कर के भाव पिछले तीन महीनों में 40 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। रक्षाबंधन के बाद अब आने वाले त्योहारों पर भी महंगाई की छाया मंडरा रही है। Unfiltered with Yogendra Joshi में पढ़ें, गन्ने की कम बुवाई से लेकर इथेनॉल ब्लेंडिंग और सरकार की देरी तक, चीनी संकट की पूरी और बेबाक पड़ताल।

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चीनी कम... यह डायलॉग हम बरसों से सुनते आ रहे हैं, हालांकि चीनी हमारे जीवन की एक ऐसी जरूरत बन गई है जिसके बिना रह पाना संभव नहीं है। अचानक चीनी के भाव में उछाल ने हमें यह संकेत दे दिया है कि चीनी का इस्तेमाल तो करें, लेकिन कम। वैसे तो महंगाई का ग्राफ लगातार ऊपर उठ रहा है और अब तक सरकार इस पर लगाम नहीं लगा पाई है। वह लाख विकास के दावे करे, देशभक्ति की बातें करे, लेकिन आम अवाम तो अभी भी ऐसी महंगाई से रूबरू है, जिससे पार पाना न पब्लिक के हाथ में है और ना ही गवर्नमेंट के। यह अलग बात है कि सरकार जनता के दिमाग में अपनी बात मनवाने के लिए कोई भी नए-नए तर्क-वितर्क करती रहती है।
चाणक्य ने कभी कहा था कि राजा वह होता है, जो टैक्स तो लगाए, लेकिन जनता को इसका पता भी न चले। इसका अर्थ यह था कि उतना ही टैक्स लगाया जाए जितना भार जनता उठा सके। यह टैक्स उसे भार नहीं, बल्कि सामान्य तौर पर महसूस होना चाहिए। फिलहाल चीनी की ही बात करें, जिसने राखी जैसे त्यौहार में कड़वाहट खोल दी। इस बात का भी कोई भरोसा नहीं कि आने वाली नवरात्रि, ईद, दीपावली, दशहरा, क्रिसमस जैसे बड़े त्यौहार भी कड़वाहट से भरे नहीं होंगे।
शक्कर के भाव लगातार बेलगाम है। विशेषज्ञ जो गणित बता रहे हैं उसके हिसाब से तो दिसंबर तक शक्कर के भाव उतरने से रहे। उतरेंगे भी तो उसे पुरानी स्थिति यानी 43 प्रति किलो से कम तो नहीं होंगे। जुलाई और अभी के भाव में अगर देखे तो शक्कर के भाव रुपए 25 के आसपास बढ़ गए हैं। आने वाले त्योहार तक 5 से 10 रुपए और बढ़ जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। तर्क दिया जा रहा है कि उचित भाव नहीं मिलने के कारण किसानों ने गन्ना कम बोया, कुछ मौसम की मार भी पड़ी और गन्ने का उत्पादन कम हुआ। अब नवंबर में नया गन्ना आएगा, तब कहीं जाकर शक्कर के कारखाने शुरू होंगे और दिसंबर या अगले साल की शुरुआती दौर में शक्कर के भाव रुपए 50 के आसपास तक हो सकते हैं।
इसके अलावा स्वाभाविक तौर पर कालाबाजारी, जमाखोरी जैसी बातें करके व्यापारियों को कठघरे में खड़ा तब-तब किया जाता है, जब-जब किसी खाद्य सामग्री का भाव निरंकुश हो जाता है। आज के वक्त में क्या सरकार में यह दूरदर्शिता नहीं होनी थी कि गन्ना कम रकबे में बोया गया है। मौसम की मार का अंदाजा भी उसे होना ही चाहिए। अब जबकि भाव 20 से 25 रुपए किलो बढ़ चुके हैं, तब कहीं जाकर सरकार एकदम कंबल फेंक कर बिस्तर से खड़ी हो गई है। लोग 70 रुपए किलो की शक्कर खा रहे हैं और अब सरकार 10 मेट्रिक टन शक्कर आयात करने जैसे कदम उठा रही है। जमाखोरों पर छापामारी की जा रही है, कालाबाजारियों के धरपकड़ शुरू हो गई है। और भी न जाने क्या-क्या दिखावटी कार्रवाईयां शुरू होंगी।
सरकार अभी तक यह नहीं समझ पाई है कि महंगाई बढऩे से अमीरों को कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता। गरीबों की झोली में तो वह खुद अपनी मेहरबानियां गेहूं-चावल-शक्कर आदि के रूप में डालती रही है। मजदूरी का भी मापदंड सरकार ने दे रखा है। असल मरण तो मध्यमवर्गीय का है। वह सम्मान की खातिर जीता है। किसी से मांग भी नहीं सकता। प्राइवेट सेक्टर में वेतन, महंगाई भत्ते के हिसाब से नहीं बढ़ती ना ही कोई पहला वेतनमान होता है और ना ही सातवां-आठवां या दसवां। बरसों बरस तक एक जैसी तनख्वाह में वह काम करता रहता है। ऐसी स्थिति में जब महंगाई बढ़ती है तो हर माह उसे लगता है मानो उसकी जेब कट गई हो। पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ तो पूरे बाजार में महंगाई बढ़ गई। ढुलाई भाड़ा सब बढ़ गया। अब शक्कर महंगी हुई है तो लोग ठीक ढंग से त्योहार भी नहीं मना सकते। नकली मावा, नकली दूध, नकली, पनीर, नकली घी का सामना तो उसे हर दिन करना ही पड़ रहा है। यह कैसा विकास है विचार इस पर होना चाहिए।
सरकार भले ही लाख इंकार करे, लेकिन इस संकट का एक बड़ा कारण इथेनॉल में गन्ना मिलने से भी है। पेट्रोल-डीजल संकट के चलते 20 से 30 प्रतिशत एथेनॉल भी मिलाया जा रहा है। इसके लिए भारी मात्रा में गन्ने का इस्तेमाल हुआ है। सरकार इस बात को खुले मन से स्वीकार नहीं कर रही है, परंतु गलती को सुधारने के लिए ही अब तुरंत शक्कर का निर्यात रोक दिया गया है। चूक तो यह भी हो गई कि जब तक निर्यात रोका गया तब तक 8 लाख टन शक्कर दूसरे देशों में भेजी जा चुकी थी। 10 लाख टन चीनी का आयात बगैर ड्यूटी किए जाने की घोषणा की है।
हम अच्छी तरह जानते हैं कि 15 रुपए किलो शक्कर का भाव होने पर अटल बिहारी वाजपेई सरकार कठघरे में आ गई थी। जमकर हंगामा हुआ था और अगला चुनाव बीजेपी हार गई थी। आश्चर्य है कि आज शक्कर 70 रुपए के आसपास हो गई, फिर भी जनता में कोई हलचल नहीं। बस सिर्फ सरकार की तरफ दया की नजर से देख रही है। इंदौर शहर में सामान्य दिनों में शक्कर की दैनिक खपत करीबन 1,000 क्विंटल (यानी 100 मीट्रिक टन) अनुमानित है। हालांकि, गर्मियों के सीजन, शादियों के दिनों या त्योहारों के समय आइसक्रीम, ठंडे पेय पदार्थों और मिठाइयों की मांग बढऩे के कारण यह खपत 15 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाती है। सियागंज स्थित थोक किराना बाजार से ही पूरे इंदौर और आसपास के जिलों में शक्कर की आपूर्ति की जाती है। इस तरह पिछले 3 महीना में शक्कर के भाव 40 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं।
वहीं इस धारणा को भी कुछ लोग झुठला रहे हैं कि गन्ने से इथेनॉल बन रहा है, इसलिए चीनी महंगी हो रही है। गन्ने से चीनी बनाने के बाद गन्ने का बेगास (खोई, छोता) बायलर में जलाने के काम आता है। इससे पेपर और पार्टिकल बोर्ड (एक तरह का प्लाईवुड, जिससे स्पीकर बॉक्स बनते हैं) भी बनाया जाता है। गन्ने का मैल भी निकलता है, जिससे जैविक खाद बनाई जाती है। पहले बड़े-बड़े खड्डों में शीरा डाल दिया जाता था या फिर नालों में बहा दिया जाता था। जबसे इथेनॉल को पेट्रोल में मिक्स किया जाने लगा है, तब से शीरे को फेंकना बंद हो गया है। इससे शुगर मिल को अतिरिक्त आमदनी होती है। यह इथेनॉल शक्कर के भाव को एक तरह से कंट्रोल करता है।
लेकिन ऐसा कहने भर से भी सरकार इस जिम्मेदारी से फारिग नहीं हो जाती। त्यौहारी सीजन में अचानक शक्कर के भाव बढऩा यह तो दर्शा ही रहा है कि या तो नीयत में खोट है या फिर सरकार अपनी नीतियों से भटक गई है।



