
₹4,300 करोड़ सालाना खर्च... फिर 2 साल में 584 बच्चों की मौत कैसे? महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं की रिपोर्ट ने खोले डरावने आंकड़े
महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं में दो साल के भीतर 584 छात्रों की मौत का आंकड़ा सामने आया है। इनमें 55 मामलों में फांसी और 28 में सर्पदंश दर्ज है। गडचिरोली में तीन छात्राओं की सांप के काटने से मौत के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर सरकार की जांच और सख्त हुई है।

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मुंबई। एक तरफ आदिवासी बच्चों की पढ़ाई और रहने के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं, दूसरी तरफ सरकारी रिकॉर्ड में मौतों का ऐसा आंकड़ा सामने आया है जिसे सिर्फ “दुर्भाग्य” कहकर छोड़ना मुश्किल है। महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं से जुड़े दो साल के आंकड़ों में 584 विद्यार्थियों की मौत दर्ज होने की बात सामने आई है। इनमें गंभीर बीमारी, दुर्घटना, फांसी और सर्पदंश जैसे कारण शामिल हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन स्कूलों का मकसद दूर-दराज के बच्चों को सुरक्षित आवास और शिक्षा देना है, वहां स्वास्थ्य और सुरक्षा की निगरानी आखिर कितनी मजबूत है।
गडचिरोली की तीन मौतों ने खुलवा दी पूरी फाइल
हाल में गडचिरोली जिले के जपतलाई स्थित आश्रमशाला में रात के समय सो रही छह छात्राओं को सांप ने काट लिया। इनमें तीन बच्चियों की मौत हो गई और बाकी का इलाज चला। घटना के बाद महाराष्ट्र सरकार ने संबंधित स्कूल की मान्यता रद्द करने, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और राज्य की आश्रमशालाओं का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराने की दिशा में कदम बढ़ाए।
इसी घटना के बाद राज्य की आश्रमशालाओं में हुई पुरानी मौतों का रिकॉर्ड फिर चर्चा में आया। रिपोर्ट के मुताबिक दो साल में कुल 584 मौतों में सरकारी आश्रमशालाओं का हिस्सा 384 और अनुदानित संस्थानों का 200 बताया गया है।
मौतों का हिसाब सबसे ज्यादा बीमारी और हादसों में
उपलब्ध विभागीय आंकड़ों में गंभीर बीमारी से 273 और विभिन्न दुर्घटनाओं में 228 विद्यार्थियों की मौत दर्ज है। इसके अलावा 55 मौतें फांसी और 28 सर्पदंश से बताई गई हैं।
दो साल में 584 मौतें — कारणवार आंकड़ा
मौत का कारण | सरकारी आश्रमशाला | अनुदानित आश्रमशाला | कुल |
|---|---|---|---|
गंभीर बीमारी | 182 | 91 | 273 |
दुर्घटना | 155 | 73 | 228 |
फांसी | 25 | 30 | 55 |
सर्पदंश | 22 | 6 | 28 |
कुल | 384 | 200 | 584 |
इन संख्याओं को देखते हुए एक बात महत्वपूर्ण है—हर मौत स्कूल परिसर में नहीं हुई। रिपोर्ट में करीब 88% मौतें घर पर और लगभग 11% स्कूल परिसर में होने की बात कही गई है। इसलिए 584 के पूरे आंकड़े को सीधे “स्कूल में हुई मौतें” कहना सही नहीं होगा। फिर भी ये बच्चे आश्रमशाला प्रणाली से जुड़े थे, इसलिए उनकी स्वास्थ्य निगरानी, बीमारी की पहचान और जोखिम प्रबंधन पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
55 फांसी के मामले सिर्फ आंकड़ा नहीं, अलग जांच मांगते हैं
कुल मौतों में 55 मामलों का कारण फांसी बताया गया है। यह संख्या अपने आप में संवेदनशील है और इसे सिर्फ प्रशासनिक टेबल में जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। हर मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं—इसलिए मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक स्थिति, संस्थागत दबाव, उत्पीड़न या दूसरे कारणों के बारे में बिना केस-स्तरीय जांच के निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा।
लेकिन इतनी बड़ी संख्या यह जरूर पूछती है कि आवासीय स्कूलों में काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और शुरुआती चेतावनी प्रणाली कितनी मजबूत है।
सर्पदंश के 28 मामले, फिर भी बच्चे फर्श पर क्यों सो रहे थे?
गडचिरोली की घटना ने इस सवाल को और तीखा कर दिया। रिपोर्टों के मुताबिक जपतलाई की छात्राएं हॉस्टल के फर्श पर सो रही थीं जब सांप ने उन्हें काटा। दिलचस्प बात यह है कि इस हादसे से कुछ दिन पहले ही सरकार ने आदिवासी छात्रावासों के लिए खाट, गद्दा, कंबल और तकिया उपलब्ध कराने संबंधी व्यवस्था तय की थी।
अब सरकार ने आश्रमशालाओं के थर्ड-पार्टी ऑडिट की घोषणा की है, जिसमें स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की जांच की जानी है।
₹4,300 करोड़ से ज्यादा बजट, फिर कमी कहां रह गई?
राज्य की करीब 500 सरकारी आश्रमशालाओं में लगभग 2.04 लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं, जबकि 556 अनुदानित संस्थानों में करीब 2.62 लाख बच्चों का नामांकन बताया गया है। इन दोनों व्यवस्थाओं पर मिलाकर सालाना ₹4,300 करोड़ से ज्यादा खर्च का दावा किया गया है।
अगर ये आंकड़े सही हैं, तो असली सवाल सिर्फ “बजट कम है” का नहीं रह जाता। तब सवाल यह बनता है कि पैसा कहां खर्च हुआ, स्वास्थ्य जांच पर कितना गया, हॉस्टल सुरक्षा का ऑडिट कितनी बार हुआ, रात की निगरानी कौन करता है और दूरस्थ स्कूलों में मेडिकल इमरजेंसी का response time कितना है।
सरकार ने अब सख्ती दिखाई, लेकिन हादसे के बाद क्यों?
गडचिरोली की मौतों के बाद संबंधित स्कूल पर कठोर कार्रवाई हुई, मंत्री अशोक उईके ने छात्रों को बेहतर सुविधा वाले संस्थान में शिफ्ट करने का निर्देश दिया और सुरक्षा ऑडिट की घोषणा भी की।
लेकिन इसी से एक असहज सवाल भी उठता है—अगर राज्य के पास पहले से विस्तृत मौतों का रिकॉर्ड था, तो इतने बड़े पैटर्न पर व्यापक सुधार पहले क्यों नहीं हुआ?
584 मौतों का आंकड़ा अपने आप किसी एक अधिकारी या संस्थान की लापरवाही साबित नहीं करता। मगर यह जरूर बताता है कि व्यवस्था को अब एक-एक केस नहीं, पूरे सिस्टम की सेहत की जांच करनी होगी।



