जन्म के 24 घंटे में खुलेगा बीमारी का राज! MGM में नवजातों की सिकल सेल स्क्रीनिंग की तैयारी
इंदौर के MGM मेडिकल कॉलेज स्थित सिकल सेल सेंटर में Newborn Screening को बड़े स्तर पर शुरू करने की तैयारी है। इससे नवजात में जन्म के शुरुआती समय में ही सिकल सेल बीमारी का जोखिम पहचाना जा सकेगा। सेंटर में HLA Typing की सुविधा भी विकसित करने की तैयारी है।

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सोचिए, एक बच्चा पैदा हुआ और उसके जीवन के पहले ही दिन यह पता चल जाए कि उसे आगे चलकर सिकल सेल जैसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी का खतरा है। अभी यह बात कल्पना जैसी लग सकती है, लेकिन इंदौर के महाराजा यशवंतराव अस्पताल यानी एमवायएच में इसे हकीकत बनाने की तैयारी चल रही है।
एमवायएच स्थित Center for Competency for Sickle Cell Disease में अब Newborn Screening को बड़े स्तर पर शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। केंद्र सरकार की टीम सेंटर की सुविधाओं का निरीक्षण कर चुकी है और नई व्यवस्था के लिए आर्थिक मदद के साथ जरूरी उपकरण उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया गया है।
इस सुविधा का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बच्चे में बीमारी के लक्षण आने का इंतजार किए बिना जन्म के शुरुआती समय में ही सिकल सेल का जोखिम पता लगाया जा सकेगा।
बीमारी दिखने से पहले ही मिल सकता है सुराग
सिकल सेल एक आनुवंशिक रक्त संबंधी बीमारी है, जिसमें शरीर में बनने वाली लाल रक्त कोशिकाओं का आकार और व्यवहार सामान्य से अलग हो जाता है। कई मामलों में बीमारी का असर धीरे-धीरे सामने आता है।
Newborn Screening की व्यवस्था शुरू होने के बाद नवजात के जन्म के तुरंत बाद ही जांच के जरिए यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि बच्चा सिकल सेल से प्रभावित है या उसके जोखिम में है।
समय पर पहचान होने का मतलब है कि बच्चे की निगरानी, जरूरी सलाह और उपचार की प्रक्रिया भी जल्द शुरू की जा सकेगी।
इंदौर से आदिवासी इलाकों तक पहुंचेगा फायदा
इस सुविधा की जरूरत मध्यप्रदेश के उन इलाकों में सबसे ज्यादा है, जहां सिकल सेल के मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश में सिकल सेल से प्रभावित करीब 75 प्रतिशत मरीज अलीराजपुर, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, झाबुआ और डिंडौरी जैसे पांच आदिवासी जिलों में केंद्रित हैं।
ऐसे क्षेत्रों में जन्म के समय ही स्क्रीनिंग शुरू होने से बीमारी को शुरुआती स्तर पर पहचानने में मदद मिल सकती है।
एमवायएच में पहले से 1400 मरीज रजिस्टर्ड
एमवायएच में सिकल सेल एनीमिया के करीब 1400 मरीज रजिस्टर्ड हैं। इन मरीजों को अस्पताल में उपचार और आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
अब सेंटर का फोकस सिर्फ बीमारी का इलाज करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बीमारी की शुरुआती पहचान और भविष्य के जोखिम को समझने पर भी होगा।
यही बदलाव सिकल सेल के खिलाफ चल रही लड़ाई में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
HLA Typing की सुविधा भी होगी विकसित
Newborn Screening के साथ सेंटर में HLA Typing की सुविधा शुरू करने की भी तैयारी है। इसके लिए केंद्र सरकार से सहयोग मिलने का आश्वासन मिला है।
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, आवश्यक उपकरण, रिएजेंट्स और दूसरी जरूरतों को शामिल करते हुए संशोधित प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जा रहा है।
HLA Typing में शरीर की कोशिकाओं पर मौजूद Human Leukocyte Antigen की पहचान और मिलान किया जाता है। यह कई महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रक्रियाओं में उपयोगी होता है।
केंद्रीय सचिव ने खुद सेंटर का किया निरीक्षण
19 अगस्त को जनजातीय कार्य मंत्रालय की केंद्रीय सचिव रंजना चोपड़ा ने MGM मेडिकल कॉलेज के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग में स्थित सिकल सेल सेंटर का निरीक्षण किया।
उन्होंने सेंटर में उपलब्ध सुविधाओं और चल रहे काम की समीक्षा की। इस दौरान सेंटर को सिकल सेल से प्रभावित जनजातीय आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने और राष्ट्रीय स्तर पर बीमारी के उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में एक मॉडल सेंटर के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया।
गंभीर मरीजों के लिए यहां होता है Red Cell Exchange
MGM का यह सेंटर सिर्फ जांच के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। यहां गंभीर सिकल सेल मरीजों के लिए Red Cell Exchange की सुविधा भी उपलब्ध है।
यह सुविधा देश के चुनिंदा चिकित्सा संस्थानों में ही मौजूद है। गंभीर हालत में दूसरे राज्यों और जनजातीय क्षेत्रों से मरीजों को भी यहां रेफर किया जाता है।
Apheresis Machine की मदद से Red Cell Exchange किया जाता है। एक मरीज की प्रक्रिया में करीब 15 से 18 यूनिट तक रक्त की जरूरत पड़ सकती है। इसका उद्देश्य शरीर में मौजूद सिकल सेल की मात्रा को कम करना होता है और प्रक्रिया के बाद इसे करीब 10 से 15 प्रतिशत तक लाने में मदद मिल सकती है।
जांच से इलाज तक कई सुविधाएं एक ही छत के नीचे
सेंटर में Bone Marrow Transplant और Chorionic Villus Sampling यानी CVS जैसी आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।
CVS जैसी जांच के जरिए गर्भावस्था के दौरान आनुवंशिक स्थिति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की जा सकती है। वहीं गंभीर मरीजों के लिए आगे के उपचार के विकल्प भी सेंटर पर उपलब्ध हैं।
यानी इंदौर का यह सेंटर सिकल सेल बीमारी की स्क्रीनिंग से लेकर गंभीर मरीजों के उपचार तक एक व्यापक चिकित्सा व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
2025 में शुरू हुआ था प्रदेश का पहला सेंटर
एमवायएच में प्रदेश के पहले Center of Competency for Sickle Cell Disease का शुभारंभ 29 मार्च 2025 को राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने किया था।
अब Newborn Screening और HLA Typing जैसी सुविधाओं के जुड़ने से सेंटर की भूमिका और बड़ी हो सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2047 तक देश से सिकल सेल एनीमिया को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में जन्म के समय ही बीमारी की पहचान करने की दिशा में उठाया जा रहा यह कदम खास तौर पर उन इलाकों के लिए अहम हो सकता है, जहां इसके मामले ज्यादा हैं।
एक बीमारी जिसका पता कई बार तब चलता है जब वह अपना असर दिखाना शुरू कर चुकी होती है, अब कोशिश यही है कि उसका सुराग उससे बहुत पहले मिल जाए—जब बच्चा अभी जिंदगी की शुरुआत ही कर रहा हो।
