भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की रिपोर्ट में अफसरों पर गिरी गाज, MIC को क्लीन चिट; 24 मौतों को दूषित पानी से जोड़ा
इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की हाईकोर्ट जांच रिपोर्ट में अधिकारियों की लापरवाही को घटना की बड़ी वजह माना गया है। रिपोर्ट के अनुसार 36 मौतों में 24 को दूषित पानी से जोड़ा गया है, जबकि 12 मामलों में स्थिति स्पष्ट नहीं है। मृतकों के परिजनों को 20 लाख रुपये मुआवजे की अनुशंसा की गई है। वहीं MIC, पूर्व निगमायुक्त दिलीप यादव और शिवम वर्मा को रिपोर्ट में क्लीन चिट दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

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इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की हाईकोर्ट जांच रिपोर्ट में अधिकारियों की लापरवाही को घटना की बड़ी वजह माना गया है। रिपोर्ट के अनुसार 36 मौतों में 24 को दूषित पानी से जोड़ा गया है, जबकि 12 मामलों में स्थिति स्पष्ट नहीं है। मृतकों के परिजनों को 20 लाख रुपये मुआवजे की अनुशंसा की गई है। वहीं MIC, पूर्व निगमायुक्त दिलीप यादव और शिवम वर्मा को रिपोर्ट में क्लीन चिट दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
भागीरथपुरा के उस दूषित पानी कांड में, जिसने इंदौर की पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया था, अब जांच रिपोर्ट के अहम निष्कर्ष सामने आने का दावा किया जा रहा है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ओर से गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट फिलहाल गोपनीय है, लेकिन रिपोर्ट से जुड़े सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी में अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं।
सबसे अहम बात यह है कि जांच में पाइपलाइन बदलने के काम में हुई देरी को हादसे की बड़ी वजह माना गया है। वहीं MIC और किसी जनप्रतिनिधि को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है।
36 मौतों में 24 को दूषित पानी से जोड़ा
जांच रिपोर्ट के मुताबिक भागीरथपुरा कांड में हुई कुल 36 मौतों में से 24 मामलों को दूषित पानी से संबंधित माना गया है। वहीं 12 मौतों के मामले में कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं होने की बात सामने आई है।
यानी जांच में दूषित पानी को मौतों की एक प्रमुख वजह माना गया है। यही वजह है कि रिपोर्ट में मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजे की भी अनुशंसा की गई है।
मृतकों के परिवार को 20 लाख मुआवजे की सिफारिश
रिपोर्ट में दूषित पानी से हुई मौतों के लिए 20 लाख रुपये मुआवजे की अनुशंसा किए जाने की जानकारी सामने आई है।
इसके अलावा प्रभावित लोगों के लिए 5 लाख रुपये मुआवजे की सिफारिश किए जाने की बात भी कही जा रही है।
अब बड़ा सवाल यह है कि हाईकोर्ट इस अनुशंसा पर क्या रुख अपनाता है और सरकार व नगर निगम इसे किस तरह लागू करते हैं।
पाइपलाइन बदलने में देरी को माना बड़ी वजह
जांच में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते हुए पाइपलाइन से जुड़े काम में हुई देरी को अहम माना गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक यदि समय रहते पुरानी लाइन बदल दी जाती तो दूषित पानी की समस्या पैदा नहीं होती और हालात इतने गंभीर नहीं होते।
यानी जांच का एक बड़ा निष्कर्ष यह है कि यह सिर्फ अचानक पैदा हुई समस्या नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर समय पर कदम नहीं उठाए जाने से संकट बढ़ा।
जल विभाग के अधिकारी पर सबसे ज्यादा सवाल
रिपोर्ट में मुख्य कार्यपालन यंत्री जल विभाग संजीव श्रीवास्तव की भूमिका का कई बार उल्लेख होने की बात सामने आई है।
जांच में उनके स्तर पर गंभीर लापरवाही माने जाने का दावा किया गया है। पाइपलाइन के काम और उससे जुड़ी प्रक्रिया में देरी को लेकर उनकी जिम्मेदारी तय किए जाने की जानकारी सामने आई है।
इसके अलावा तत्कालीन अपर आयुक्त IAS रोहित सिसोनिया के स्तर पर टेंडर प्रक्रिया में देरी और तत्कालीन अपर आयुक्त संदीप सोनी की लापरवाही का भी उल्लेख होने की बात कही जा रही है।
एस. प्रजापति समेत अन्य अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।
MIC और जनप्रतिनिधियों को क्लीन चिट
रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक यह है कि नगर निगम की MIC को इस मामले में क्लीन चिट दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
इसके साथ ही किसी जनप्रतिनिधि को भी घटना के लिए जिम्मेदार नहीं माना गया है।
रिपोर्ट में पूर्व निगमायुक्त दिलीप यादव और शिवम वर्मा को भी क्लीन चिट दिए जाने की बात सामने आई है।
हाईकोर्ट ने बनाई थी जांच कमेटी
भागीरथपुरा कांड की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने 27 जनवरी को रिटायर्ड जस्टिस सुशील गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच दल गठित किया था।
जांच के बाद रिपोर्ट करीब सात दिन पहले हाईकोर्ट में जमा किए जाने की जानकारी है। रिपोर्ट फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है।
संबंधित याचिकाकर्ताओं के वकील रजिस्ट्रार के पास जाकर रिपोर्ट देख सकते हैं।
रिपोर्ट सार्वजनिक कराने की मांग
रिपोर्ट को लेकर अब हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं भी दाखिल की गई हैं।
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और याचिकाकर्ता प्रमोद द्विवेदी तथा महेश गर्ग की ओर से इंटरविनर याचिका दायर की गई है। अधिवक्ता रितेश इनानी ने भी याचिका दाखिल की है।
इन याचिकाओं में रिपोर्ट को सार्वजनिक करने, उसकी कॉपी उपलब्ध कराने और मामले की लाइव स्ट्रीमिंग शुरू करने जैसी मांगें रखी गई हैं।
अब अगली सुनवाई में इन मांगों पर बहस होगी।
अब नजर हाईकोर्ट के अगले कदम पर
भागीरथपुरा कांड में सामने आ रही जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर पाइपलाइन बदलने का काम समय पर हो जाता, तो क्या इतनी बड़ी त्रासदी को टाला जा सकता था?
फिलहाल रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं हुई है। इसलिए सामने आए निष्कर्षों को रिपोर्ट से जुड़ी जानकारी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। अब अगली सुनवाई में हाईकोर्ट का रुख इस पूरे मामले की आगे की दिशा तय करेगा।
