इंदौर में IAS की कोर्ट का फर्जी आदेश बनाकर जमीन कब्जाने की कोशिश, वकील और कंपनी पर उठे सवाल
इंदौर में अपर आयुक्त तरुण भटनागर की कोर्ट के नाम से कथित फर्जी आदेश तैयार कर जमीन पर कब्जा दिलाने की कोशिश का मामला सामने आया है। यह आदेश हाईकोर्ट में भी पेश किया गया और इसके आधार पर तहसीलदार ने कब्जा दिलाने के लिए टीम बना दी थी। शुरुआती जांच में आदेश फर्जी पाए जाने के बाद प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है।

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इंदौर। जमीन के विवाद में इंदौर प्रशासन से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने अधिकारियों को भी हैरान कर दिया। वरिष्ठ IAS अधिकारी और अपर आयुक्त तरुण भटनागर की कोर्ट के नाम से कथित तौर पर एक फर्जी आदेश तैयार किया गया। इतना ही नहीं, इस आदेश को हाईकोर्ट में पेश करने के साथ ही तहसीलदार के सामने भी रखा गया और इसके आधार पर जमीन का कब्जा दिलाने की तैयारी शुरू हो गई।
मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में आदेश को फर्जी बताया गया है। अब सवाल यह है कि यह आदेश किसने तैयार किया, इसे तैयार कराने के पीछे कौन था और आखिर इसके जरिए जमीन पर कब्जा लेने की कोशिश क्यों की गई?
करीब 5 हजार वर्गफीट जमीन को लेकर है विवाद
पूरा मामला इंदौर के खजराना इलाके की जमीन से जुड़ा है। जमीन सर्वे नंबर 388/2/14 में बताई गई है, जिसका क्षेत्रफल करीब 5 हजार वर्गफीट है।
इस जमीन को लेकर पुष्परतन रियलिटी प्राइवेट लिमिटेड और राजीव अग्निहोत्री के बीच सौदे को लेकर विवाद चल रहा है। बताया गया है कि अग्निहोत्री ने जमीन पुष्परतन कंपनी को बेचने का सौदा किया था, लेकिन बाद में विवाद मध्यस्थता की प्रक्रिया तक पहुंच गया।
इसी जमीन पर लक्ष्मीबाई नाम की महिला झोपड़ी बनाकर रह रही हैं। कंपनी की ओर से इसी कब्जे को हटाने की कानूनी कोशिश की जा रही थी।
पहले तहसीलदार और फिर SDO कोर्ट से भी कंपनी को राहत नहीं मिली
झोपड़ी हटाने के लिए पुष्परतन रियलिटी ने वर्ष 2023 में तहसीलदार कोर्ट का रुख किया था। लेकिन जमीन का विवाद पहले से मध्यस्थता में चल रहा था। इसी आधार पर तहसीलदार कोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद कंपनी ने SDO जूनी इंदौर की अदालत में अपील की। वहां भी वर्ष 2024 में कंपनी को राहत नहीं मिली।
इसके बाद मामला अपर आयुक्त तरुण भटनागर की कोर्ट तक पहुंचा।
यहीं से पूरे मामले में फर्जी आदेश का विवाद सामने आया।
20 अप्रैल 2026 के नाम से सामने आया आदेश
अपर आयुक्त की कोर्ट में चल रही अपील के बीच 20 अप्रैल 2026 की तारीख वाला एक आदेश सामने आया। इस आदेश में निचली अदालतों के फैसले को पलटते हुए पुष्परतन रियलिटी को जमीन का कब्जा देने की बात कही गई थी।
आदेश में यह भी लिखा था कि लक्ष्मीबाई के पास जमीन पर अपने कब्जे को साबित करने वाले दस्तावेज नहीं हैं और इसलिए उनका कब्जा मान्य नहीं है। इसी आधार पर झोपड़ी हटाकर कंपनी को जमीन सौंपने की बात कही गई थी।
बाद में जब इस आदेश की जांच हुई तो प्रशासन के सामने यह बात आई कि अपर आयुक्त की कोर्ट से ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं हुआ था।
फर्जी आदेश के आधार पर तहसीलदार ने बना दी टीम
मामले को गंभीर बनाने वाली बात यह है कि कथित फर्जी आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहा।
आदेश के आधार पर कलेक्ट्रेट स्तर पर अधिकारियों से संपर्क किया गया। इसके बाद 20 अगस्त को तहसीलदार जूनी इंदौर की ओर से जमीन का कब्जा दिलाने के लिए एक दल भी गठित कर दिया गया।
यानी अगर मामला समय रहते सामने नहीं आता तो प्रशासनिक अमला कथित फर्जी आदेश के आधार पर मौके पर पहुंचकर जमीन का कब्जा दिलाने की कार्रवाई कर सकता था।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान खुला मामला
पूरे मामले का खुलासा हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान हुआ। रविवार को हुई अर्जेंट सुनवाई में जब कथित आदेश अदालत के सामने आया तो उसकी वैधता पर सवाल उठे।
इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर भी आदेश की जांच शुरू की गई।
अधिकारियों ने संबंधित अधिवक्ता से पूछा कि उनके पास यह आदेश कहां से आया। जांच के दौरान सामने आया कि इसकी सत्यापित कॉपी अधिवक्ता आशीष अग्रवाल की ओर से उपलब्ध कराई गई थी।
अब प्रशासन इस बात की जांच कर रहा है कि फर्जी आदेश तैयार करने और उसे इस्तेमाल करने के पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे।
वकील की भूमिका की भी जांच
मामले में अधिवक्ता आशीष अग्रवाल का नाम सामने आया है। आरोप है कि उन्होंने कथित फर्जी आदेश उपलब्ध कराया और इसके आधार पर कलेक्ट्रेट स्तर पर अधिकारियों से कार्रवाई कराने की कोशिश की।
बताया गया है कि प्रशासन ने जब आदेश की सत्यता को लेकर सवाल उठाए तो संबंधित अधिवक्ता से दस्तावेज के स्रोत के बारे में जानकारी मांगी गई।
फिलहाल उनकी भूमिका की जांच की जा रही है और प्रशासन की ओर से आगे कानूनी कार्रवाई की बात कही गई है।
यह भी जांच का विषय है कि क्या कंपनी की ओर से इस आदेश के बारे में जानकारी थी या किसी स्तर पर फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल करके कंपनी को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई।
संभागायुक्त बोले- शुरुआती जांच में आदेश फर्जी
संभागायुक्त IAS भास्कर लक्षकार ने मामले पर कहा कि शुरुआती जांच में सामने आया आदेश फर्जी पाया गया है।
उन्होंने बताया कि जमीन से जुड़ी अपील की सुनवाई अभी चल रही है और प्रशासन पूरे मामले में जरूरी कार्रवाई कर रहा है।
यानी प्रशासन ने फिलहाल उस आदेश को वैध नहीं माना है और उसके आधार पर की गई कार्रवाई को भी जांच के दायरे में रखा गया है।
हाईकोर्ट में जमीन विवाद पर क्या हुआ?
इसी मामले में हाईकोर्ट की अर्जेंट सुनवाई के दौरान जमीन के कब्जे को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई।
अदालत ने पुराने आदेशों और उपलब्ध रिकॉर्ड को देखते हुए कहा कि चौकीदार को जमीन पर कब्जे का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि मूल विवाद दो जमीन मालिकों के बीच का है।
इसी आधार पर लक्ष्मीबाई की याचिका खारिज कर दी गई।
हालांकि, यह फैसला अपने आप में कथित फर्जी आदेश को सही नहीं ठहराता। फर्जी आदेश किसने बनाया और उसे सरकारी रिकॉर्ड की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश कैसे हुई, यह अलग जांच का विषय है।
तरुण भटनागर ने क्या कहा?
अपर आयुक्त तरुण भटनागर ने मामले पर कहा कि यह प्रकरण अभी उनकी कोर्ट में चल रहा है और सामने आया आदेश फर्जी है।
उनके मुताबिक प्रशासन से इस संबंध में रिपोर्ट मिली है और उसके आधार पर आगे कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
फिलहाल पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक वरिष्ठ IAS अधिकारी की कोर्ट के नाम से कथित फर्जी आदेश आखिर तैयार कैसे हुआ और उसे प्रशासनिक स्तर तक असली दस्तावेज की तरह पहुंचाने में किस-किस की भूमिका रही।
जांच पूरी होने के बाद ही इस पूरे मामले की तस्वीर साफ होगी।


