भागीरथपुरा कांड की 600 पन्नों की रिपोर्ट आज हाईकोर्ट में खुलेगी, तय हो सकती है अफसरों की जिम्मेदारी
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों की जांच रिपोर्ट पर आज मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सुनवाई होगी। रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने 20 अगस्त को 600 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंपी थी। अब अदालत रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका, मौतों के कारण और पीड़ित परिवारों के मुआवजे पर आगे फैसला कर सकती है।

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इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों का मामला एक बार फिर अदालत के सामने है। करीब छह महीने पहले जिस घटना ने इंदौर की व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े किए थे, उसकी जांच रिपोर्ट अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के सामने खुलने वाली है। 600 से ज्यादा पन्नों की सीलबंद रिपोर्ट में आखिर दूषित पानी की वजह क्या बताई गई है, 36 मौतों से इसका कितना सीधा संबंध है और लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है—इन सवालों पर आज सुनवाई में तस्वीर साफ हो सकती है।
जांच आयोग ने 20 अगस्त को अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंप दी थी। अब अदालत रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर निर्देश दे सकती है। एक याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट की कॉपी उपलब्ध कराने और इसे सार्वजनिक करने की मांग भी की है।
छह महीने बाद फिर अदालत के सामने भागीरथपुरा
भागीरथपुरा में 26 दिसंबर 2025 से 25 फरवरी 2026 के बीच दूषित पानी की वजह से बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। इस दौरान 36 मौतों की जानकारी सामने आई। घटना के बाद देशभर में इंदौर की पेयजल व्यवस्था और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया था। आयोग को सिर्फ पानी दूषित होने की वजह तलाशने तक सीमित नहीं रखा गया था। उसे मौतों का कारण, अधिकारियों की भूमिका, राहत व्यवस्था और पीड़ितों को दिए गए मुआवजे समेत पूरे घटनाक्रम की जांच करनी थी।
पाइपलाइन से लेकर सीवेज तक, तलाशा गया दूषित पानी का कारण
आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर लोगों के घरों तक पहुंचने वाला पानी दूषित कैसे हुआ। इसके लिए पेयजल लाइन, सीवेज सिस्टम और इलाके की दूसरी व्यवस्थाओं से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की गई।
यह भी देखा गया कि कहीं सीवेज का पानी पेयजल लाइन में तो नहीं पहुंचा। पाइपलाइन में किसी तरह की टूट-फूट या तकनीकी खराबी थी या नहीं और क्या किसी औद्योगिक गतिविधि से पानी प्रभावित हुआ—इन सभी पहलुओं को जांच में शामिल किया गया।
सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड पर भरोसा नहीं किया गया, बल्कि प्रभावित लोगों के बयान और मेडिकल रिकॉर्ड भी जांचे गए। इसका मकसद यह पता लगाना था कि दूषित पानी से कितने लोग बीमार हुए और दर्ज हुई 36 मौतों में कितनी मौतों का सीधा संबंध दूषित पानी से था।
नगर निगम से स्वास्थ्य विभाग तक मांगे गए रिकॉर्ड
जांच का दायरा काफी बड़ा रखा गया था। आयोग ने इंदौर नगर निगम, जिला प्रशासन, इंदौर विकास प्राधिकरण और स्वास्थ्य विभाग समेत संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए।
घटना के दौरान मरीजों को मिली चिकित्सा सुविधा, प्रभावित इलाकों में राहत कार्य, पानी की जांच और प्रशासन की ओर से उठाए गए कदमों की भी समीक्षा की गई। यानी जांच में यह सवाल भी शामिल रहा कि संकट सामने आने के बाद प्रशासन ने कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दी।
अब नजर अफसरों की भूमिका पर
भागीरथपुरा कांड में सिर्फ व्यवस्था की तकनीकी खामी ही सवालों के घेरे में नहीं रही। यह भी जांच का हिस्सा था कि संबंधित अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों ने अपनी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई।
तत्कालीन निगम कमिश्नर दिलीप यादव, तत्कालीन अपर कमिश्नर रोहित सिसोनिया, कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव और स्थानीय पार्षद कमल वाघेला समेत कई अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में रही।
हालांकि, अभी रिपोर्ट सीलबंद है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि आयोग ने किस अधिकारी या कर्मचारी को जिम्मेदार माना है। आज की सुनवाई के बाद इस दिशा में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
36 मौतों का पानी से कितना सीधा संबंध?
इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू मौतों का कारण है। दूषित पानी की घटना के दौरान 36 मौतें हुईं, लेकिन जांच आयोग को यह भी तय करना था कि इनमें से कितनी मौतों का सीधा संबंध दूषित पानी से साबित होता है।
इसके लिए मेडिकल रिकॉर्ड, बीमारी के लक्षण, इलाज की जानकारी और दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों को देखा गया है। अदालत के सामने रिपोर्ट आने के बाद इसी निष्कर्ष का असर आगे की कार्रवाई और मुआवजे की व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
पीड़ित परिवारों के मुआवजे पर भी फैसला संभव
जांच आयोग के दायरे में प्रभावित परिवारों को राहत और मुआवजे का मुद्दा भी था। ऐसे में रिपोर्ट के निष्कर्ष सामने आने के बाद हाईकोर्ट यह देख सकता है कि पीड़ित परिवारों को अब तक क्या राहत मिली और क्या उन्हें अतिरिक्त मुआवजे या दूसरी सहायता की जरूरत है।
याचिकाकर्ता की ओर से रिपोर्ट की कॉपी सार्वजनिक किए जाने की मांग भी इसी सुनवाई को अहम बनाती है। अब देखना होगा कि अदालत सीलबंद रिपोर्ट को किस तरह रिकॉर्ड पर लेती है और उसके निष्कर्षों को सार्वजनिक करने को लेकर क्या रुख अपनाती है।
भागीरथपुरा सिर्फ हादसा नहीं, व्यवस्था की परीक्षा भी थी
दूषित पानी की घटना के बाद भागीरथपुरा सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं रहा। इसने इंदौर जैसे शहर की जल व्यवस्था, पाइपलाइन की निगरानी, सीवेज प्रबंधन और सरकारी विभागों के बीच तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े किए।
विपक्ष ने इसे लेकर सरकार और नगर निगम पर निशाना साधा था। दूसरी ओर प्रशासन की ओर से राहत, जांच और प्रभावित परिवारों की मदद के कदम उठाए गए। अब जांच रिपोर्ट अदालत के सामने है और इसी रिपोर्ट से यह तय होने की दिशा बनेगी कि भागीरथपुरा की त्रासदी के पीछे केवल तकनीकी चूक थी या कहीं प्रशासनिक लापरवाही की भी जिम्मेदारी बनती है।
आज की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार जांच आयोग की पूरी रिपोर्ट अदालत के सामने होगी। रिपोर्ट में क्या निकला और हाईकोर्ट किसे जिम्मेदार मानता है, इसका असर आगे की प्रशासनिक कार्रवाई और पीड़ित परिवारों की लड़ाई—दोनों पर पड़ सकता है।


