आजादी के दिन जेल से आजादी: इंदौर सेंट्रल जेल से 12 उम्रकैदी रिहा, अच्छे आचरण पर मिली नई जिंदगी
स्वतंत्रता दिवस पर इंदौर सेंट्रल जेल से 12 बंदी रिहा हुए, 11 पुरुष और एक महिला, सभी हत्या के मामलों में उम्रकैद काट रहे थे। जेल में अच्छे आचरण और सुधारात्मक गतिविधियों के आधार पर मिली छूट, मध्यप्रदेश की जेल नीति के तहत हर साल पांच मौकों पर होती है ऐसी रिहाई।

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आजादी के दिन 12 लोगों को मिली एक और तरह की आजादी। इंदौर सेंट्रल जेल से स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 12 बंदी रिहा किए गए हैं, जिनमें 11 पुरुष और एक महिला शामिल है। सभी हत्या के मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। जेल में लंबे समय तक अच्छा आचरण और सुधारात्मक गतिविधियों में भागीदारी देखकर प्रशासन ने इनकी बाकी सजा माफ करने का फैसला लिया।
साल में पांच मौकों पर मिलती है यह रियायत
यह कोई अकेली घटना नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार की जेल नीति के तहत हर साल पांच खास मौकों पर पात्र बंदियों को समय से पहले रिहा किया जाता है, 26 जनवरी, 14 अप्रैल (आंबेडकर जयंती), 15 अगस्त, 2 अक्टूबर और 15 नवंबर। इस साल 14 अप्रैल को ही राज्यभर की जेलों से 87 उम्रकैदी रिहा हुए थे, और उससे पहले 26 जनवरी को 94 बंदियों को यही राहत मिली थी। सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से जेल में अनुशासन बना रहता है और बंदियों को सुधरने का प्रोत्साहन मिलता है।
इसी स्वतंत्रता दिवस पर अकेले इंदौर तक बात सीमित नहीं रही। जबलपुर की नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल से 18 बंदी, सतना से 12, ग्वालियर से 6 और उज्जैन की भैरवगढ़ जेल से 9 बंदियों को इसी आधार पर रिहाई मिली। पड़ोसी छत्तीसगढ़ के दुर्ग में भी 19 उम्रकैदियों को स्वतंत्रता दिवस से पहले छोड़ा गया।
जेल में सीखा हुनर, साथ ले गए कमाई
इंदौर से रिहा हुए बंदियों ने सजा के दौरान बुनाई और सिलाई जैसे व्यावसायिक काम सीखे और इनसे पारिश्रमिक भी कमाया। रिहाई के वक्त जेल प्रशासन ने यह कमाई सम्मानपूर्वक उन्हें सौंपी, ताकि बाहर की जिंदगी की शुरुआत आसान हो सके। मध्यप्रदेश की जेलों में यह सुधारात्मक मॉडल अब नतीजे भी दिखा रहा है, राज्य में इस साल जनवरी तक जेलों की भीड़ में करीब 10 फीसदी की कमी दर्ज की गई, जिसका एक बड़ा कारण यही समय-पूर्व रिहाई नीति मानी जा रही है।


