
आजादी की वह रात जब इंदौर में किशोर कुमार गाते रहे: अंग्रेज प्रिंसिपल ने फहराया तिरंगा, ₹400 जुटाकर छात्रों ने मनाया था पहला 15 अगस्त
इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज के पुराने दस्तावेज आजादी के पहले जश्न की दिलचस्प कहानी दर्ज करते हैं। 14 अगस्त 1947 की आधी रात कॉलेज की घंटी बजी, अगली सुबह तत्कालीन प्राचार्य डॉ. ए.ए. स्कॉट ने तिरंगा फहराया और शाम को उस समय कॉलेज के छात्र रहे किशोर कुमार गांगुली ने साथियों के साथ देर रात तक गीतों से माहौल को यादगार बना दिया।

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इंदौर। घड़ी में रात के ठीक 12 बजे थे। तारीख बदलकर 15 अगस्त 1947 हुई और इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज की विशाल घंटी गूंज उठी। अंग्रेजी हुकूमत खत्म हो चुकी थी और एक आजाद देश की पहली सुबह सामने थी। कॉलेज तिरंगों और रोशनी से जगमगा रहा था। सुबह एक अंग्रेज प्राचार्य ने उसी भारत का तिरंगा फहराया, जो कुछ घंटे पहले तक ब्रिटिश शासन के अधीन था। शाम हुई तो मंच पर बीए द्वितीय वर्ष का एक छात्र आया—किशोर कुमार गांगुली। आगे चलकर यही नौजवान भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार आवाजों में शामिल हुआ। उस रात किशोर और उनके साथी गाते रहे और कॉलेज आजादी के जश्न में डूबा रहा।
अंग्रेज प्रिंसिपल के हाथों चढ़ा आजाद भारत का तिरंगा
15 अगस्त की सुबह करीब 8 बजे कॉलेज प्रांगण में तत्कालीन प्राचार्य डॉ. ए.ए. स्कॉट ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। सामने विद्यार्थी, शिक्षक और कर्मचारी मौजूद थे। यह दृश्य अपने आप में उस दौर की बदलती तस्वीर था—कैनेडियन मिशन से जुड़ी संस्था, विदेशी प्राचार्य और परिसर में स्वतंत्र भारत का तिरंगा। इसके बाद ब्रांसन हॉल में विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने आजादी को लेकर अपने विचार रखे।
सिर्फ छह दिन में खड़ी कर दी जश्न की पूरी तैयारी
कॉलेज के पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक विद्यार्थियों के पास तैयारी के लिए बेहद कम वक्त था। औपचारिक व्यवस्था बनने का इंतजार करने के बजाय छात्र एहसान अली खान ने जिम्मेदारी संभाली और अलग-अलग कामों के लिए उप-समितियां बनाई गईं। वित्त की जिम्मेदारी एहसान अली खान के पास रही, मनोरंजन की कमान कल्याण कुमार गांगुली यानी बाद के अभिनेता अनूप कुमार ने संभाली, जबकि स्वल्पाहार और महिला समिति के लिए भी अलग जिम्मेदारियां तय की गईं।
तिरंगा देकर जुटाए ₹400, 1947 में यह छोटी रकम नहीं थी
आजादी के उत्सव के लिए छात्रों ने अपनी जेब से सहयोग किया और दूसरों से भी राशि जुटाई। धन संग्रह का तरीका भी आजादी के रंग में था—योगदान करने वालों को प्रतीक के रूप में तिरंगा दिया जाता था। कक्षा प्रतिनिधि परिसर में तिरंगे बांटते रहे और महज पांच दिनों में विद्यार्थियों ने ₹400 से अधिक जमा कर लिए। उस दौर में छात्रों द्वारा इतनी जल्दी यह रकम जुटाना उनके उत्साह की कहानी भी कहता है।
14 अगस्त की आधी रात घंटी बजी और जागता रहा कॉलेज
सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र कवठेकर के विवरण के मुताबिक 14 अगस्त की रात ठीक 12 बजे कॉलेज की बड़ी घंटी बजाकर स्वतंत्रता के आगमन का स्वागत किया गया। इमारत पर जगह-जगह तिरंगे लगाए गए थे और विद्युत सज्जा से पूरा परिसर रोशन था। रात से शुरू हुआ उत्सव अगली सुबह ध्वजारोहण और फिर दिनभर के कार्यक्रमों तक चलता रहा।
दिन में खेल का मैदान, शाम होते ही ब्रांसन हॉल बना मंच
ध्वजारोहण और विचार कार्यक्रम के बाद शाम करीब चार बजे तक खेलकूद प्रतियोगिताएं चलीं, जिनकी जिम्मेदारी डॉ. आर. मोजेस ने संभाली। शाम छह बजे स्वल्पाहार हुआ, लेकिन इस ऐतिहासिक दिन का वह हिस्सा अभी बाकी था, जिसे आने वाले दशकों बाद भी याद किया जाना था। सात बजे ब्रांसन हॉल का मंच संगीत और प्रस्तुतियों के लिए तैयार हुआ।
फिर मंच पर आए बीए के छात्र ‘किशोर कुमार गांगुली’
तब वे हिंदी सिनेमा के महान पार्श्वगायक नहीं, बल्कि कॉलेज के बीए द्वितीय वर्ष के छात्र किशोर कुमार गांगुली थे। किशोर कुमार और उनके साथियों ने देशभक्ति, स्वतंत्रता और क्रांतिकारी भावों से जुड़े गीतों की प्रस्तुतियां शुरू कीं। मीरा मुखर्जी और पाडगांवकर की नृत्य प्रस्तुतियां भी हुईं। कार्यक्रम इतना लंबा चला कि आजादी का जश्न देर रात तक खिंच गया।
एक पुराने कॉलेज बुलेटिन में बची है उस रात की कहानी
इस पूरे आयोजन का महत्वपूर्ण दस्तावेज क्रिश्चियन कॉलेज की मार्च 1948 में प्रकाशित वार्षिक पत्रिका है। उसमें आजादी के पहले दिन को लेकर विद्यार्थियों की भावनाएं और कार्यक्रमों का उल्लेख मिलता है। पत्रिका से जुड़ी संपादकीय टीम में अलग-अलग समुदायों के विद्यार्थी और शिक्षक शामिल थे। रामजी वर्मा ने भारत माता का स्केच भी तैयार किया था, जो उस समय किशोर कुमार के मित्र बताए जाते हैं और बाद में मल्हार आश्रम में फाइन आर्ट के शिक्षक रहे।
बंटवारे के बीच इंदौर के इस कैंपस ने दिखाई दूसरी तस्वीर
यह जश्न उस दौर में हो रहा था जब देश आजाद जरूर हुआ था, लेकिन विभाजन की हिंसा, पलायन और सांप्रदायिक तनाव से गुजर रहा था। ऐसे समय क्रिश्चियन कॉलेज में अलग-अलग धर्म और पृष्ठभूमि के छात्र-शिक्षक एक साथ भारत की स्वतंत्रता का उत्सव तैयार कर रहे थे। इसीलिए 15 अगस्त 1947 की यह कहानी सिर्फ किशोर कुमार के गीतों या ध्वजारोहण तक सीमित नहीं रहती—यह उस पीढ़ी की तस्वीर भी है, जिसने पहली बार अपने देश का स्वतंत्रता दिवस देखा था।



