2019 में ही मिल गई थी दूषित पानी की चेतावनी, फिर भी सात साल तक चलता रहा खेल; भागीरथपुरा में 36 मौतों पर न्यायिक जांच रिपोर्ट में गंभीर खुलासे
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों की न्यायिक जांच रिपोर्ट ने पानी और सीवरेज व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में ही 60 ट्यूबवेल और हैंडपंप के पानी की गुणवत्ता खराब मिलने की चेतावनी दी गई थी, लेकिन समय पर प्रभावी कार्रवाई का रिकॉर्ड नहीं मिला।

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इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों की कहानी अब सिर्फ एक स्थानीय जल संकट की नहीं रह गई है। न्यायिक जांच आयोग की करीब 600 पन्नों की रिपोर्ट ने उस सिस्टम की तस्वीर सामने रखी है, जिसके रहते लोगों तक ऐसा पानी पहुंचता रहा जिसे पीने योग्य नहीं माना गया था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि खतरे की जानकारी समय रहते मिलने के बाद भी उसे रोका क्यों नहीं गया। जांच आयोग के मुताबिक, भागीरथपुरा में पानी की गुणवत्ता को लेकर चेतावनी करीब सात साल पहले ही सामने आ चुकी थी।
हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस सुशील गुप्ता की अध्यक्षता वाले आयोग ने पानी-सीवरेज व्यवस्था की निगरानी, रखरखाव और अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की। रिपोर्ट में इसे ऐसी त्रासदी नहीं माना गया, जिसे समय रहते टाला नहीं जा सकता था।
2019 की रिपोर्ट ने बता दिया था पानी सुरक्षित नहीं
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 8 फरवरी 2019 को भागीरथपुरा के 60 ट्यूबवेल और हैंडपंप के पानी की जांच की थी। जांच में पानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं मिला था।
बोर्ड ने ऐसे पानी से स्वास्थ्य को खतरा होने की आशंका जताते हुए उचित क्लोरीनेशन के बाद ही इस्तेमाल की सलाह दी थी।
जांच आयोग को रिकॉर्ड में यह नहीं मिला कि उस चेतावनी के बाद तत्कालीन निगम आयुक्त और अपर आयुक्त के स्तर से ऐसी प्रभावी कार्रवाई हुई हो, जिससे समस्या को स्थायी रूप से दूर किया जा सके।
यही बिंदु पूरी रिपोर्ट का सबसे गंभीर हिस्सा बनकर सामने आता है।
पानी और सीवर की लाइनें बनीं बड़ी चिंता
आयोग ने सिर्फ पानी के सैंपल की बात नहीं की, बल्कि उस पूरे नेटवर्क को जांचा जिसके जरिए पानी लोगों के घरों तक पहुंचता है।
रिपोर्ट में पेयजल और सीवरेज पाइपलाइन की डिजाइन, उनके बीच की दूरी, क्रॉसिंग, लीकेज और बैकफ्लो जैसे तकनीकी पहलुओं पर ध्यान दिया गया है। पानी की लाइन में सीवेज पहुंचने की आशंका को रोकने के लिए जरूरी सुरक्षा उपायों और नियमित निगरानी की जरूरत बताई गई है।
पानी का प्रेशर और गुणवत्ता नियमित रूप से जांचना, गलत कनेक्शन रोकना और पाइपलाइन में खराबी सामने आते ही उसे दुरुस्त करना जरूरी बताया गया है।
फाइलें चलती रहीं, काम की प्रक्रिया में भी देरी
आयोग की नजर उस प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी गई, जो भागीरथपुरा से जुड़े कामों के लिए अपनाई गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक विभिन्न स्तरों पर फाइलों की प्रक्रिया में देरी हुई और टेंडर से जुड़ी कार्रवाई भी समय पर पूरी नहीं हो सकी।
15 अक्टूबर 2025 को अपर कमिश्नर रोहित सिसोनिया के स्तर पर चर्चा हुई। इसके बाद 18 दिसंबर को संजीव श्रीवास्तव के साथ चर्चा और 26 दिसंबर को वित्तीय बोली खोले जाने का उल्लेख रिपोर्ट में है।
आयोग ने माना कि इस प्रक्रिया में हुई देरी को टाला जा सकता था। अब यह तय करने की जरूरत बताई गई है कि फाइल किस स्तर पर और किस वजह से लंबित रही।
कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में
रिपोर्ट में टेंडर और तकनीकी प्रक्रिया से जुड़े कई अधिकारियों और कर्मचारियों का उल्लेख किया गया है। इनमें कार्यकारी इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव, सहायक अभियंता सरताज कुमार प्रजापति, उप अभियंता सम्यक जैन, प्रभारी तकनीकी अधिकारी रोहित राय, टेंडर उप अभियंता श्वेता सिंह और टेंडर क्लर्क प्रज्ञा तिवारी सहित अन्य नाम शामिल हैं।
निवास बागरी और शरद सोनी की जिम्मेदारी का भी रिपोर्ट में जिक्र है। एक जगह तत्कालीन एडिशनल कमिश्नर भव्या मित्तल की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आती है।
टेंडर समिति की भूमिका पर भी उठे सवाल
आयोग ने टेंडर प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में हुई देरी को भी गंभीरता से लिया है। समिति की भूमिका की जांच कर यह पता लगाने की जरूरत बताई गई है कि देरी आखिर किस स्तर पर हुई और उसके पीछे कारण क्या था।
इस समिति में संजीव कुमार श्रीवास्तव, श्रीकांत कांटे, देवधर दरवाई और अभय राजनगांवकर शामिल थे।
शिवम वर्मा और प्रतिभा पाल को जिम्मेदार नहीं माना
जांच रिपोर्ट में तत्कालीन निगम आयुक्त शिवम वर्मा को इस मामले में जिम्मेदार नहीं माना गया है। आयोग के मुताबिक उपलब्ध रिकॉर्ड में उनके स्तर पर ऐसी विशेष चूक सामने नहीं आई, जिसके आधार पर उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा सके।
पूर्व निगम आयुक्त प्रतिभा पाल को भी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी गई है।
अब सिर्फ जांच नहीं, व्यवस्था बदलने की जरूरत
आयोग ने भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए पेयजल व्यवस्था की लगातार निगरानी की सिफारिश की है। पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच के साथ पाइपलाइन नेटवर्क का निरीक्षण और रखरखाव जरूरी बताया गया है।
लीकेज, कम प्रेशर, गंदगी, अवैध कनेक्शन या पाइपलाइन खराब होने की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
भागीरथपुरा की 36 मौतों के बाद सामने आई यह रिपोर्ट एक पुराने सवाल को फिर सामने रखती है—जब दूषित पानी की जानकारी पहले से थी, तो उसे रोकने के लिए समय रहते वह कदम क्यों नहीं उठाया गया, जिसकी जरूरत थी?