इंदौर में 96 दिन, 42 मौतें: आंकड़े बता रहे शहर की सुरक्षा में कहां चूक हो रही है
1 जून से 6 सितंबर तक इंदौर के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में हुई 42 मौतों का पुलिस रिकॉर्ड खंगालने पर तस्वीर साफ है — हर दूसरी मौत सड़क हादसे में हुई, हर पांचवीं आत्महत्या से। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, शहर के लिए चेतावनी है।

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96 दिन का हिसाब
इंदौर पुलिस के आंकड़े झकझोरने वाले हैं। 1 जून 2026 से 6 सितंबर 2026 के बीच, यानी महज 96 दिनों में, शहर के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में 42 लोगों की मौत हुई। औसत निकालें तो हर सवा दो दिन में एक मौत। यह कोई एक वजह से नहीं हुआ — सड़क हादसे, आत्महत्या, करंट, हत्या और जहरखुरानी, हर सबब ने अपना हिस्सा जोड़ा है।
आंकड़े बांटकर देखें तो तस्वीर और साफ होती है: 19 मौतें (45.2%) सड़क हादसों में, 9 (21.4%) आत्महत्या या संदिग्ध आत्महत्या में, 5 (11.9%) करंट लगने से, 4 (9.5%) हत्या में, और बाकी 5 मौतें जहरीला पदार्थ खाने, संदिग्ध परिस्थितियों और एक ऑपरेशन के दौरान हुईं।
पुलिस हर मामले में मौके पर पहुंची, मर्ग कायम किए और जहां जरूरत पड़ी वहां आरोपियों को गिरफ्तार किया। लेकिन आंकड़े सिर्फ पुलिस की तेजी का हिसाब नहीं देते — वे बताते हैं कि शहर में कहां सुरक्षा तंत्र अब भी कमजोर है।
सड़क हादसे: सबसे बड़ा हत्यारा
96 दिनों में हुई हर दूसरी मौत सड़क हादसे में हुई। कुल 19 जानें गईं — तेज रफ्तार वाहन, बाइक-कार की भिड़ंत, डिवाइडर से टक्कर और अज्ञात वाहनों की चपेट में आने से।
बाणगंगा थाना क्षेत्र के मरीमाता चौराहे पर एक कार की टक्कर से एक्टिवा सवार राज सोनेरे और नंदकिशोर सोलंकी की मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक कार चालक अंकित को गिरफ्तार किया गया है। बाकी हादसों में भी पुलिस ने पंचनामा और मर्ग की कार्रवाई पूरी की।
सिर्फ आंकड़े देखकर यह कहना जल्दबाजी होगी कि हर हादसा एक जैसी वजह से हुआ, लेकिन इतनी बड़ी संख्या खुद सवाल खड़ा करती है — क्या शहर के व्यस्त चौराहों पर ट्रैफिक मैनेजमेंट और स्पीड कंट्रोल पर पुलिस और प्रशासन का ध्यान उतना है जितना होना चाहिए।
करंट से पांच मौतें: कहां चूकी सुरक्षा
बिजली के संपर्क में आने से 5 लोगों की जान गई — भंवरकुआ में केसरबाई, एरोड्रम में करण, राजेंद्र नगर में गब्बर, अन्नपूर्णा क्षेत्र में कपिल और रावजी बाजार में कनिका। इनमें से कुछ मौतें काम के दौरान हुईं, और पुलिस ने इन मामलों में सुरक्षा इंतजामों से जुड़े पहलुओं की पड़ताल करते हुए संबंधित लोगों पर प्रकरण भी दर्ज किए हैं।
पांच मौतें एक जैसे कारण से, अलग-अलग इलाकों में — यह पैटर्न बिजली सुरक्षा मानकों और निगरानी में खामी की तरफ इशारा करता है। यह सवाल बिजली विभाग और श्रम सुरक्षा एजेंसियों दोनों से पूछा जाना चाहिए।
आत्महत्या के मामलों में पारिवारिक विवाद बड़ी वजह
96 दिनों में 9 मामले आत्महत्या या संदिग्ध आत्महत्या के दर्ज हुए। एमआईजी क्षेत्र की सोमनाथ की जूनी चाल में मनोज पिता खेमचंद (50) की मौत के बाद पुलिस ने मर्ग कायम कर परिजनों और आसपास के लोगों के बयान दर्ज किए हैं। कुछ अन्य मामलों में पारिवारिक विवाद सामने आए हैं, जबकि बाकी की वजह पुलिस सुसाइड नोट और बयानों के आधार पर तलाश रही है।
आत्महत्या के आंकड़े दूसरी सबसे बड़ी वजह होना अपने आप में एक सामाजिक संकट का संकेत है, जिस पर सिर्फ पुलिस जांच नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक परामर्श तंत्र पर भी बात होनी चाहिए।
हत्या के चार मामले, पुलिस की सख्ती जारी
खजराना, बड़गोंदा, बाणगंगा और लसूड़िया क्षेत्र में हत्या के 4 मामले दर्ज हुए। बाणगंगा में श्रीराम राजपूत की हत्या के आरोप में पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार किया है। लसूड़िया में सुरक्षा गार्ड धर्मेंद्र की मौत के मामले में पुलिस ने आरोपी की तलाश तेज कर दी है और कानूनी कार्रवाई जारी है।
जहर और संदिग्ध मौतें: जांच अभी बाकी
इस दौरान 2 लोगों की मौत जहरीला पदार्थ खाने से हुई, जबकि 2 मौतें संदिग्ध परिस्थितियों में सामने आईं। सभी मामलों में पुलिस ने मर्ग कायम कर साक्ष्य, घटनास्थल और परिजनों के बयानों की पड़ताल शुरू की है। इसके अलावा एक 9 वर्षीय बच्चे की ऑपरेशन के दौरान मौत का मामला भी सामने आया, जिसकी परिस्थितियों की जांच चल रही है।
आंकड़े क्या कहते हैं
तीन महीने में 42 मौतें और उनमें लगभग आधी सिर्फ सड़क हादसों में — यह इंदौर जैसे तेजी से बढ़ते शहर के लिए ट्रैफिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर सीधा सवाल है। दूसरी तरफ, करंट से हुई पांच मौतें अलग-अलग इलाकों में एक जैसी वजह की पुनरावृत्ति दिखाती हैं, जो किसी एक हादसे का नतीजा नहीं बल्कि सिस्टम की खामी लगती है।
आत्महत्या के मामलों की संख्या भी नजरअंदाज करने लायक नहीं है। पुलिस जांच अपनी जगह है, लेकिन अगर वजह बार-बार पारिवारिक विवाद निकल रही है, तो यह प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक अलग तरह की जिम्मेदारी की मांग करता है।
पुलिस की कार्रवाई की रफ्तार पर सवाल नहीं है — ज्यादातर मामलों में मर्ग तुरंत कायम हुए और गिरफ्तारियां भी हुईं। सवाल यह है कि इतनी मौतों को रोकने के लिए निवारक कदम कहां हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े पेश नहीं करती, बल्कि शहर के सामने आईना रखती है।