30 सिगरेट जितना जहरीला दम! दिल्ली की हवा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, वाहनों का धुआं बना सबसे बड़ी चुनौती
दिल्ली-NCR में बढ़ते वायु प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट में गंभीर चिंता जताई गई। सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने जहरीली हवा की तुलना रोजाना 30 सिगरेट पीने से होने वाले नुकसान से की। अदालत में बताया गया कि 5 नवंबर को प्रदूषण में पराली का योगदान करीब 14 प्रतिशत था। वाहनों का धुआं, कचरा जलाना और ऊर्जा उत्पादन भी प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों के रूप में सामने आए। अब सवाल है कि जिम्मेदार एजेंसियां साफ हवा के लिए ठोस कदम कब उठाएंगी?

दिल्ली-NCR की हवा एक बार फिर लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनती दिखाई दे रही है। प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान पराली के साथ वाहनों से निकलने वाले धुएं, कचरा जलाने और ऊर्जा उत्पादन जैसे स्रोतों पर भी सवाल उठे। एमिकस क्यूरी ने मौजूदा हालात की गंभीरता बताते हुए हवा की तुलना रोजाना 30 सिगरेट पीने से होने वाले नुकसान से की। अदालत में हुई चर्चा ने एक बार फिर पूछा है कि आखिर प्रदूषण के असली कारणों पर कार्रवाई कब होगी?
अदालत में प्रदूषण की गंभीरता पर चिंता
दिल्ली की बिगड़ती वायु गुणवत्ता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान राजधानी के प्रदूषण के अलग-अलग कारणों पर चर्चा हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले को गंभीरता से सुना। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन भी शामिल थे।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने प्रदूषण की गंभीर स्थिति की ओर अदालत का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि हवा की स्थिति इतनी खराब है कि लोगों को बोलने तक में परेशानी हो रही है। इसी दौरान उन्होंने प्रदूषित हवा के असर की तुलना प्रतिदिन 30 सिगरेट पीने से होने वाले नुकसान से की।
यह तुलना राजधानी में वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को रेखांकित करती है।
बारिश ने घटाया प्रदूषण, लेकिन समाधान नहीं मिला
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने बारिश के बाद प्रदूषण के स्तर में आई कमी का उल्लेख किया। बारिश और मौसम में बदलाव से हवा को कुछ समय के लिए राहत जरूर मिल सकती है, लेकिन इससे प्रदूषण की समस्या खत्म नहीं होती।
यही दिल्ली की सबसे बड़ी चुनौती है। मौसम बदलते ही हवा की गुणवत्ता में सुधार दिखाई देता है, लेकिन प्रदूषण के स्थायी स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने से हालात दोबारा बिगड़ने का खतरा बना रहता है।
पराली का योगदान 14 प्रतिशत, फिर बाकी प्रदूषण कहां से?
एमिकस क्यूरी ने अदालत को बताया कि 5 नवंबर को दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने का योगदान लगभग 14 प्रतिशत था। यह आंकड़ा इस बहस को महत्वपूर्ण बनाता है कि राजधानी की जहरीली हवा के लिए केवल खेतों में जलने वाली पराली को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
अगर पराली का योगदान सीमित है, तो बाकी प्रदूषण के स्रोतों पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है। अदालत में हुई चर्चा इसी व्यापक तस्वीर की ओर इशारा करती है।
वाहनों का धुआं और कचरा जलाना भी सवालों के घेरे में
सुनवाई के दौरान परिवहन क्षेत्र को प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत बताया गया। वाहनों से निकलने वाला धुआं, ऊर्जा उत्पादन और खुले में कचरा जलाने जैसी गतिविधियां दिल्ली-NCR की हवा को प्रभावित कर रही हैं।
इसका मतलब है कि प्रदूषण से निपटने की रणनीति केवल पराली रोकने तक सीमित नहीं रह सकती। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, वाहनों के उत्सर्जन पर निगरानी बढ़ाना, कचरा जलाने पर प्रभावी रोक लगाना और औद्योगिक व ऊर्जा स्रोतों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना भी जरूरी है।
सवाल वही, जवाबदेही किसकी?
दिल्ली में हर साल प्रदूषण बढ़ने के साथ रोकथाम के उपायों की चर्चा तेज हो जाती है। प्रतिबंध, निगरानी अभियान और अस्थायी व्यवस्थाएं लागू होती हैं, लेकिन हवा की गुणवत्ता में स्थायी सुधार अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने साफ किया है कि समस्या बहुआयामी है और इसका समाधान भी व्यापक होना चाहिए। अब सवाल यह है कि केंद्र, दिल्ली सरकार, NCR के राज्य और स्थानीय निकाय अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाते हैं?
आखिर कब तक दिल्ली के लोग मौसम की मेहरबानी के भरोसे साफ हवा का इंतजार करेंगे? प्रदूषण के स्रोत सामने हैं, लेकिन उन पर लगातार और प्रभावी कार्रवाई कब दिखाई देगी?




