
DPDP Act पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस, 21 मीडिया संस्थानों ने दी चुनौती; पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। DNPA से जुड़े 21 समाचार प्रकाशकों ने Digital Personal Data Protection Act, 2023 और Digital Personal Data Protection Rules, 2025 के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी रिपोर्टिंग, गोपनीय समाचार स्रोतों और सूचना के अधिकार पर असर पड़ सकता है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित है।

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नई दिल्ली। डिजिटल डेटा संरक्षण कानून को लेकर केंद्र सरकार और समाचार प्रकाशकों के बीच कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में Digital Personal Data Protection Act, 2023 और इससे जुड़े Digital Personal Data Protection Rules, 2025 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
27 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई में DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी गोराडिया दीवान ने पक्ष रखा। संगठन से जुड़े 21 समाचार प्रकाशकों की मुख्य चिंता यह है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता और जनहित से जुड़ी खबरों की रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।
21 समाचार प्रकाशकों ने कानून को क्यों दी चुनौती?
DNPA डिजिटल समाचार प्रकाशकों का संगठन है। इससे जुड़े संस्थानों में नेटवर्क18, NDTV, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स इंटरनेट सहित प्रमुख मीडिया समूह शामिल हैं।
याचिका में डिजिटल डेटा संरक्षण कानून के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों का पत्रकारिता पर ऐसा प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए, जिससे सार्वजनिक हित के मामलों की जांच और रिपोर्टिंग कठिन हो जाए।
समाचार प्रकाशकों की मुख्य मांग है कि पत्रकारिता से संबंधित गतिविधियों के लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा और स्पष्ट छूट सुनिश्चित की जाए।
सहमति लेने की शर्त से जांच प्रभावित होने की आशंका
याचिकाकर्ताओं की प्रमुख चिंताओं में व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति लेने का सवाल शामिल है।
खोजी पत्रकारिता में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं, कॉरपोरेट गड़बड़ियों और सार्वजनिक पदों से जुड़े मामलों की जांच की जाती है। ऐसे मामलों में यदि पत्रकार को जांच के विषय बने व्यक्ति को पहले सूचना देनी पड़े या उसकी सहमति लेनी पड़े, तो याचिकाकर्ताओं के अनुसार जांच प्रभावित हो सकती है।
उनका तर्क है कि संबंधित व्यक्ति को पहले से जानकारी मिलने पर सबूत नष्ट करने, गवाहों को प्रभावित करने या जांच में बाधा डालने का जोखिम पैदा हो सकता है।
यह याचिकाकर्ताओं की आशंका है। कानून के वास्तविक प्रभाव और उसकी संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय अदालत को करना है।
खबर हटाने और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा का सवाल
याचिकाकर्ताओं ने डेटा मिटाने और सहमति वापस लेने से संबंधित प्रावधानों पर भी चिंता जताई है।
उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत डेटा को हटाने का अधिकार मिलता है और इसका दायरा पत्रकारिता में प्रकाशित सामग्री तक पहुंचता है, तो जनहित में प्रकाशित कुछ रिपोर्टों को हटाने या उनमें बदलाव करने का दबाव बन सकता है।
समाचार प्रकाशकों ने यह भी आशंका जताई है कि कानून के तहत सरकारी एजेंसियों को जानकारी उपलब्ध कराने से जुड़े अधिकारों का इस्तेमाल पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर करने के लिए किया जा सकता है।
गोपनीय स्रोत खोजी पत्रकारिता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई बार भ्रष्टाचार या अन्य अनियमितताओं से जुड़ी जानकारी देने वाले लोग अपनी पहचान सार्वजनिक होने के डर से सामने नहीं आते। ऐसे स्रोतों की सुरक्षा को लेकर याचिका में चिंता व्यक्त की गई है।
सूचना के अधिकार पर भी उठाए सवाल
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सूचना का अधिकार यानी RTI है।
डिजिटल डेटा संरक्षण कानून के साथ सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) में भी संशोधन किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे से संबंधित प्रावधानों में बदलाव का असर सार्वजनिक हित में जानकारी हासिल करने पर पड़ सकता है।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पत्रकार, शोधकर्ता और नागरिक सरकारी कामकाज, सार्वजनिक खर्च तथा प्रशासनिक निर्णयों की जांच के लिए सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि, व्यक्तिगत निजता की सुरक्षा भी कानून का एक प्रमुख उद्देश्य है। अदालत के सामने व्यापक सवाल यह है कि निजता की रक्षा और जनहित में सूचना उपलब्ध कराने के बीच उचित संतुलन कैसे बनाया जाए।
किन कानूनी प्रावधानों को चुनौती दी गई है?
27 अक्टूबर की सुनवाई से संबंधित प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, DNPA ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल की है।
याचिका में Digital Personal Data Protection Act की धाराओं 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) को चुनौती दी गई है। इसके अलावा Digital Personal Data Protection Rules, 2025 के नियम 16, 17 और 23 को भी चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। इन प्रावधानों की वैधता पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का क्या मतलब है?
सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को नोटिस जारी करना यह दर्शाता है कि अदालत ने याचिका पर सरकार का पक्ष मांगा है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अदालत ने कानून को असंवैधानिक मान लिया है।
अदालत को याचिकाकर्ताओं की दलीलों, केंद्र सरकार के जवाब और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विचार करना होगा। कानून के किसी प्रावधान पर रोक या उसे निरस्त करने का निर्णय अलग न्यायिक आदेश से ही होगा।
17 नवंबर की सुनवाई पर नजर
मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित है। इस सुनवाई में केंद्र सरकार का जवाब और आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण हो सकती है।
यह मामला डिजिटल निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना के अधिकार और खोजी पत्रकारिता के बीच संतुलन से जुड़ा है। इसका परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि व्यक्तिगत डेटा संरक्षण से जुड़े नियमों को पत्रकारिता और जनहित की रिपोर्टिंग पर किस तरह लागू किया जाए।
फिलहाल, DNPA की मांगें याचिका का हिस्सा हैं और विवादित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर अंतिम न्यायिक निर्णय आना बाकी है।



