हिरासत में मौत, FIR में करीब दो साल की देरी—सुप्रीम कोर्ट ने CBI को सौंपी जांच; परिवार को ₹25 लाख
छत्तीसगढ़ में श्रवण सूर्यवंशी की कथित हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए जांच CBI को सौंप दी है। अदालत ने FIR दर्ज करने में करीब दो साल की देरी पर भी सवाल उठाए और मृतक के परिवार को ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच करने को कहा है।

Audio tools for this article
नई दिल्ली। एक व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत हुई, लेकिन मामले में FIR दर्ज होने में करीब दो साल लग गए। अब सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं जताते हुए मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया है।
मामला श्रवण सूर्यवंशी की कथित हिरासत में मौत से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए और मामले की स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई।
अदालत के सामने सबसे गंभीर पहलुओं में से एक FIR दर्ज करने में हुई लंबी देरी रही। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल किया कि हिरासत में मौत जैसे गंभीर मामले में प्राथमिकी दर्ज करने में करीब दो वर्ष क्यों लगे।
₹25 लाख अंतरिम मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को मृतक के परिवार को ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। यह मुआवजा मामले में अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी तय होने से अलग है।
अदालत ने केवल मौत की परिस्थितियों की जांच CBI को नहीं सौंपी, बल्कि उन अधिकारियों के आचरण की जांच का रास्ता भी खोला है जिन पर मामले को दबाने या सही तरीके से जांच नहीं करने के आरोप लगे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने राज्य अधिकारियों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की।
अब CBI के सामने दो सवाल
जांच का पहला हिस्सा यह पता लगाना होगा कि श्रवण सूर्यवंशी की मौत किन परिस्थितियों में हुई और क्या हिरासत के दौरान उनके साथ हिंसा हुई थी।
दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि मौत के बाद पुलिस और प्रशासन ने क्या किया। FIR में देरी क्यों हुई, किस अधिकारी के पास कब जानकारी पहुंची और जांच की शुरुआती प्रक्रिया में किसी स्तर पर तथ्य छिपाने या कार्रवाई टालने की कोशिश हुई या नहीं—CBI जांच में इन पहलुओं की पड़ताल हो सकती है।
हालांकि संबंधित अधिकारियों पर लगाए गए आरोपों को अभी सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। अंतिम जिम्मेदारी CBI की जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया से तय होगी।



