
₹650 करोड़ की खरीद पर सवाल, जवाब में ‘जांच जारी’... स्वास्थ्य मंत्री भड़के—ORS से X-Ray मशीन तक पूरा हिसाब दो
दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में ORS, बेडशीट और पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद से जुड़ी कथित ₹650 करोड़ की अनियमितताओं की जांच पर मंत्री डॉ. पंकज सिंह ने विभागीय जवाब खारिज कर दिया। अब 17 अगस्त तक दस्तावेजों के साथ नई रिपोर्ट मांगी गई है।

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नई दिल्ली। ORS का पाउच कितने में खरीदा, बाजार और सरकारी खरीद की दर में कितना अंतर था, बेडशीट की कीमत कैसे तय हुई और पोर्टेबल एक्स-रे मशीन की अंतिम लागत में क्या-क्या जोड़ा गया? दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में कथित ₹650 करोड़ की खरीद अनियमितताओं की जांच में अब स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज सिंह ने इन्हीं सवालों का कागजी हिसाब मांग लिया है। विभाग ने पहले जो जवाब भेजा, उससे मंत्री संतुष्ट नहीं हुए। 12 अगस्त को जारी पत्र में उन्होंने साफ कर दिया कि सिर्फ यह बताकर फाइल बंद नहीं की जा सकती कि मामला जांच एजेंसियों के पास है।
मंत्री ने पूछा था हिसाब, जवाब में नहीं मिले जरूरी आंकड़े
मामला दवाओं, सर्जिकल सामग्री और मेडिकल उपकरणों की खरीद से जुड़ा है। मंत्री ने इसकी प्रगति जानने के लिए स्वास्थ्य विभाग से विस्तृत जानकारी मांगी थी, लेकिन सचिव के माध्यम से आया जवाब कई महत्वपूर्ण सवालों पर स्पष्ट जानकारी नहीं दे सका। मंत्री ने इसे “पूरी तरह असंतोषजनक” बताते हुए दोबारा रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया है।
अब विभाग को केवल घटनाक्रम बताने के बजाय खरीद की दर, GST, लैंडेड कॉस्ट, खरीदी गई मात्रा और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड सामने रखने होंगे। खास तौर पर ORS पाउच, बेडशीट और हैंडहेल्ड पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद को दस्तावेजों के साथ समझाने को कहा गया है।
फाइल जांच एजेंसी के पास है तो भुगतान का रिकॉर्ड कहां गया?
मंत्री के पत्र का सबसे अहम हिस्सा यहीं है। विभाग की ओर से यदि यह तर्क दिया जाता है कि मूल खरीद फाइलें जांच एजेंसी के पास हैं, तो भी मंत्री ने पूछा है कि बाकी सरकारी रिकॉर्ड से जानकारी क्यों नहीं निकाली गई?
सरकारी भुगतान केवल एक बिल देखकर नहीं होता। उसके साथ सप्लाई ऑर्डर, इनवॉइस, GST का ब्यौरा, डिलीवरी चालान, सामान की मात्रा का सत्यापन और निरीक्षण एवं स्वीकृति से जुड़े दस्तावेज रहते हैं। मंत्री का कहना है कि सामान्य वित्तीय नियमों के तहत भुगतान से पहले इनकी जांच होती है, इसलिए CPA, Accounts Branch और Pay & Accounts Office में मौजूद रिकॉर्ड से पूरा ब्यौरा निकाला जा सकता है।
यानी अब विभाग को यह बताना होगा कि पैसा किस सामान के लिए, कितनी मात्रा पर, किस दर से और किन दस्तावेजों के आधार पर जारी हुआ।
ORS, बेडशीट और X-Ray मशीन—तीन खरीद पर खास नजर
नई रिपोर्ट में इन तीन खरीदों का रिकॉर्ड प्रमुखता से मांगा गया है। केवल कीमत बताना पर्याप्त नहीं होगा। उत्पाद की स्पेसिफिकेशन क्या थी, सप्लाई ऑर्डर किस आधार पर जारी हुआ, सामान कब पहुंचा, कितनी मात्रा स्वीकार की गई और दूसरी उपलब्ध दरों से तुलना कैसे हुई—इन सवालों का जवाब भी रिकॉर्ड के साथ देना होगा।
इस निर्देश का महत्व इसलिए भी है क्योंकि कथित अनियमितता की रकम ₹650 करोड़ बताई गई है। हालांकि यह राशि अभी आरोप और जांच का विषय है; जांच पूरी होने से पहले इसे सिद्ध घोटाला नहीं माना जा सकता।
‘रिकॉर्ड नहीं है’ तो अब कारण भी लिखना पड़ेगा
मंत्री ने विभाग के लिए एक रास्ता खुला रखा है, लेकिन शर्त के साथ। अगर कोई दस्तावेज वास्तव में जांच एजेंसी ने जब्त कर लिया है या किसी कानूनी प्रतिबंध के कारण जानकारी नहीं दी जा सकती, तो विभाग केवल “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” लिखकर नहीं बच सकेगा।
नई रिपोर्ट में स्पष्ट करना होगा कि कौन-सा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, क्यों नहीं है और उसे देने में कौन-सी कानूनी या जांच संबंधी बाधा है। जहां संभव हो, उस दावे के समर्थन में संबंधित दस्तावेज भी लगाने होंगे।
अब सचिव की व्यक्तिगत जिम्मेदारी
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को पूरी कवायद व्यक्तिगत रूप से सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। उन्हें सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी से लेकर अकाउंट्स और भुगतान से जुड़े कार्यालयों तक रिकॉर्ड खंगालकर एक बिंदुवार रिपोर्ट तैयार करवानी होगी।
इसके लिए समय भी तय कर दिया गया है—17 अगस्त 2026।
इस बीच सरकारी अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल उपकरणों की खरीद में देरी को लेकर भी संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई है। यानी स्वास्थ्य विभाग में अब सवाल केवल पुरानी खरीद के हिसाब का नहीं, मौजूदा सप्लाई व्यवस्था का भी है।
₹650 करोड़ का आरोप सही है या खरीद का अपना गणित? अब कागज बताएंगे
इस मामले में अभी जांच जारी है, इसलिए किसी अधिकारी, एजेंसी या सप्लायर की जिम्मेदारी पहले से तय करना उचित नहीं होगा। लेकिन मंत्री के नए निर्देश ने जांच का फोकस बिल्कुल साफ कर दिया है—दावे नहीं, दस्तावेज चाहिए।
17 अगस्त की रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि उसमें पहली बार खरीद की दर से लेकर मात्रा, GST, सप्लाई और भुगतान तक का हिसाब एक साथ सामने आ सकता है। उसके बाद ही तस्वीर साफ होगी कि ₹650 करोड़ की कथित अनियमितताओं के आरोप के पीछे रिकॉर्ड क्या कहानी बताते हैं।


