दुष्कर्म पीड़िता को 24 सप्ताह तक गर्भसमापन के लिए कोर्ट जाना जरूरी नहीं, MP हाईकोर्ट ने अस्पतालों को नियम बताने के दिए निर्देश
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने स्पष्ट किया है कि कानून के दायरे में 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था वाली दुष्कर्म पीड़िता को गर्भसमापन के लिए हर मामले में हाईकोर्ट से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त को यह कानूनी स्थिति प्रदेश के अस्पतालों, विशेष रूप से सरकारी अस्पतालों तक पहुंचाने के निर्देश दिए हैं।

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इंदौर। दुष्कर्म के बाद गर्भवती हुई महिला को कानूनी रूप से गर्भसमापन कराने के लिए क्या हर बार अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा? मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है।
हाईकोर्ट ने कहा है कि कानून के तहत पात्र दुष्कर्म पीड़िता की गर्भावस्था 24 सप्ताह तक है तो हर मामले में गर्भसमापन के लिए अदालत की अनुमति आवश्यक नहीं है। योग्य चिकित्सक Medical Termination of Pregnancy Act और संबंधित नियमों के तहत आवश्यक चिकित्सकीय राय के आधार पर प्रक्रिया कर सकते हैं।
मामले में पीड़िता की गर्भावस्था करीब 13 सप्ताह और एक दिन की थी। उपलब्ध आदेश के अनुसार अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में प्रथम दृष्टया हाईकोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता ही नहीं थी और कानून के मुताबिक चिकित्सा स्तर पर निर्णय लिया जा सकता था।
अस्पतालों तक क्यों पहुंचाना पड़ा आदेश?
मामले का बड़ा पहलू सिर्फ एक पीड़िता तक सीमित नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त को निर्देश दिया कि इस कानूनी स्थिति की जानकारी अस्पतालों, खासकर सरकारी अस्पतालों तक पहुंचाई जाए, ताकि पात्र मामलों में पीड़िताओं को अनावश्यक रूप से अदालत भेजने से बचा जा सके।
इसका सीधा संबंध समय से है। गर्भसमापन के मामलों में हर गुजरते सप्ताह के साथ चिकित्सा और कानूनी परिस्थितियां बदल सकती हैं। अनावश्यक प्रशासनिक देरी पीड़िता के सामने और गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।
पहले भी हाईकोर्ट स्पष्ट कर चुका है नियम
यह पूरी तरह नया कानूनी सिद्धांत नहीं है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फरवरी 2025 के एक आदेश में भी स्पष्ट किया गया था कि दुष्कर्म पीड़िता के मामले में 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था का गर्भसमापन MTP Act के प्रावधानों के अनुसार अदालत का आदेश लिए बिना किया जा सकता है, जबकि 24 सप्ताह से अधिक के मामलों में अलग कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रिया लागू होती है।
इंदौर पीठ के पुराने आदेश में दुष्कर्म पीड़िताओं को समय पर चिकित्सा और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए पुलिस, जिला अदालतों और हाईकोर्ट रजिस्ट्री की प्रक्रिया पर भी निर्देश दिए जा चुके हैं।
24 सप्ताह का मतलब ‘स्वतः अनुमति’ नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी जरूरी है।
हाईकोर्ट के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि 24 सप्ताह तक हर गर्भावस्था का गर्भसमापन स्वतः किया जा सकता है। MTP Act में निर्धारित पात्रता, महिला की सहमति, गर्भावस्था की अवधि और आवश्यक चिकित्सकीय राय जैसी शर्तों का पालन करना जरूरी रहेगा।
दुष्कर्म पीड़िताएं MTP Rules में उन विशेष श्रेणियों में शामिल हैं जिनके लिए निर्धारित परिस्थितियों में गर्भावस्था की अवधि 24 सप्ताह तक होने पर termination का प्रावधान है।
असली सवाल अब स्वास्थ्य व्यवस्था से
हाईकोर्ट की कानूनी स्थिति स्पष्ट होने के बाद अगला सवाल अस्पतालों की व्यवस्था का है।
क्या प्रदेश के जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों को इन नियमों की जानकारी है? कितनी पीड़िताओं को पिछले वर्षों में 24 सप्ताह से कम गर्भावस्था होने के बावजूद अदालत जाने को कहा गया? और क्या स्वास्थ्य विभाग अब सभी सरकारी अस्पतालों के लिए एक समान कार्यप्रणाली जारी करेगा?
अदालत के निर्देश के बाद स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई इस फैसले का वास्तविक असर तय करेगी।



