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मक्का डिफेंस पैक्ट से दिल्ली क्यों सतर्क? पाकिस्तान-तुर्की की पुरानी आतंकी कड़ियों ने बढ़ाई चिंता, सऊदी भूमिका पर भी नजर
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मक्का डिफेंस पैक्ट से दिल्ली क्यों सतर्क? पाकिस्तान-तुर्की की पुरानी आतंकी कड़ियों ने बढ़ाई चिंता, सऊदी भूमिका पर भी नजर

Digital News DeskDigital News Desk5 min read11/08/26

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की की बढ़ती रक्षा साझेदारी ने भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ाई हैं। पाकिस्तान के पुराने आतंकी नेटवर्क और तुर्की से जुड़े मामलों के कारण दिल्ली इस नए समीकरण पर नजर रख रही है।

Lokswami AI

नई दिल्ली। मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की की बढ़ती रक्षा साझेदारी की तस्वीर सामने आई तो दुनिया ने इसे नए सैन्य समीकरण के तौर पर देखा, लेकिन दिल्ली की चिंता सिर्फ हथियारों और सेनाओं तक सीमित नहीं है। भारत के लिए असली सवाल उस पुराने रास्ते का भी है, जहां पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठन, खाड़ी से फंडिंग और तुर्की तक पहुंचे संदिग्ध कट्टरपंथी नेटवर्क अलग-अलग मामलों में जांच एजेंसियों के सामने आते रहे हैं। नया समझौता इन गतिविधियों को समर्थन देता है, इसका कोई सार्वजनिक सबूत नहीं है, लेकिन तीन देशों की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी ने पुराने रिकॉर्ड को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

समझौते से ज्यादा उसका बैकग्राउंड अहम

भारत की चिंता समझने के लिए इस गठजोड़ के तीनों देशों को एक ही नजर से देखना ठीक नहीं होगा। पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों का भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों से पुराना इतिहास रहा है। दूसरी तरफ तुर्की का नाम हाल के वर्षों में कुछ ऐसे मामलों में सामने आया, जहां भारत को निशाना बनाने वाले संदिग्धों के कथित संपर्क या कट्टरपंथी बनने के रास्तों की जांच हुई। सऊदी अरब की मौजूदा सरकार आतंकवाद और उसकी फंडिंग के खिलाफ कार्रवाई करती रही है, लेकिन अतीत में वहां से पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के लिए धन जुटाने वाले व्यक्तियों के मामले भी अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड में दर्ज हुए हैं।

लाल किला धमाके की जांच ने तुर्की की तरफ क्यों मोड़ी नजर?

10 नवंबर 2025 को दिल्ली में लाल किले के पास हुए विस्फोट के बाद जांच में कई संदिग्ध संपर्कों की पड़ताल की गई। रिपोर्टों में दावा किया गया कि मामले से जुड़े उमर उन नबी और मुजम्मिल शकील ने 2022 में तुर्की की यात्रा की थी। जांच एजेंसियों के सामने सवाल यह रहा कि यह यात्रा सामान्य थी या वहां किसी कट्टरपंथी नेटवर्क अथवा हैंडलर से संपर्क हुआ था। इस हिस्से को अभी जांच से जुड़े दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, क्योंकि किसी विदेशी यात्रा का होना अपने आप में आतंकवादी संबंध साबित नहीं करता।

तुर्की का एक पुराना मामला भी सुरक्षा एजेंसियों के रिकॉर्ड में

भारत की चिंता केवल लाल किला मामले तक सीमित नहीं है। अगस्त 2022 में रूस की सुरक्षा एजेंसी FSB ने एक संदिग्ध को पकड़ा था, जिसके बारे में दावा किया गया कि उसे भारत में आत्मघाती हमला करने के लिए तैयार किया गया था। रूसी एजेंसी के मुताबिक वह मध्य एशिया का रहने वाला था, पहले ऑनलाइन कट्टरपंथी हुआ और बाद में इस्तांबुल में कथित ISIS संपर्क के जरिए आगे की तैयारी कराई गई। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण बना क्योंकि भारत को निशाना बनाने की कथित साजिश में तुर्की की जमीन संपर्क बिंदु के रूप में सामने आई थी।

सऊदी अरब का जिक्र आते ही पुरानी फंडिंग का रिकॉर्ड सामने आता है

इस कहानी का तीसरा सिरा सऊदी अरब से जुड़ता है, लेकिन यहां वर्तमान सरकार और पुराने आतंकी फंडिंग नेटवर्क के बीच फर्क रखना बेहद जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में महमूद मोहम्मद अहमद बहाज़िक का नाम लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े फाइनेंसर के रूप में दर्ज रहा है। उस पर सऊदी अरब में संगठन के लिए धन जुटाने से जुड़े आरोप थे और 2008 में उसे संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया था। ऐसे पुराने मामलों के कारण भारतीय एजेंसियां खाड़ी क्षेत्र में होने वाली संदिग्ध फंडिंग पर लंबे समय से नजर रखती आई हैं।

पुराना दौर भारत को आज भी क्यों याद है?

1990 और 2000 के दशक में पाकिस्तान आधारित कट्टरपंथी संगठनों के लिए विदेशों से पैसा जुटाने, लोगों को प्रभावित करने और नेटवर्क खड़ा करने के कई मामले सामने आए। भारत की चिंता इसी इतिहास से निकलती है। यदि पाकिस्तान को किसी नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के जरिए सैन्य, राजनीतिक या संस्थागत पहुंच बढ़ती है, तो दिल्ली स्वाभाविक रूप से यह देखना चाहेगी कि उसका असर केवल रक्षा सहयोग तक रहता है या गैर-राज्य नेटवर्क भी किसी तरह इसका फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।

क्या तीनों देशों का गठजोड़ भारत के खिलाफ है?

फिलहाल ऐसा कहना तथ्यों से आगे निकलना होगा। किसी रक्षा समझौते और आतंकी नेटवर्क के बीच सीधा संबंध साबित करने वाला सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं है। सऊदी अरब और भारत के बीच मजबूत आर्थिक तथा रणनीतिक रिश्ते भी हैं। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को ‘भारत के खिलाफ आतंकी गठबंधन’ कहना सही नहीं होगा। असली चिंता पाकिस्तान की मौजूदगी और उसके साथ जुड़े पुराने सुरक्षा रिकॉर्ड की है।

दिल्ली के लिए चुनौती बंदूक से ज्यादा नेटवर्क की

आज आतंकवाद केवल सीमा पार से घुसपैठ कराने का खेल नहीं रह गया है। ऑनलाइन कट्टरपंथ, सोशल मीडिया संपर्क, एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म, विदेशी फंडिंग, डिजिटल भर्ती और तीसरे देश में बैठा हैंडलर सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में तुर्की, पाकिस्तान और खाड़ी के बीच बढ़ती आवाजाही या सुरक्षा सहयोग का हर पहलू भारतीय एजेंसियों के लिए निगरानी का विषय बनना स्वाभाविक है।

एक समझौते से खतरा तय नहीं होता, लेकिन इतिहास नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता

इस पूरी कहानी में सबसे जरूरी बात यही है कि आशंका और प्रमाण को अलग रखा जाए। नया रक्षा समीकरण अपने आप में भारत पर आतंकी खतरा साबित नहीं करता, लेकिन पाकिस्तान स्थित संगठनों का रिकॉर्ड, विदेशों में सामने आए पुराने फंडिंग नेटवर्क और तुर्की से जुड़ी कुछ सुरक्षा जांचें दिल्ली को सतर्क रहने की पर्याप्त वजह देती हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि तीनों देशों की नजदीकी केवल सरकारों और सेनाओं के बीच रहती है या इसके आसपास सक्रिय दूसरे नेटवर्क भी नई जगह तलाशने की कोशिश करते हैं।

भारत के लिए असली सवाल आगे का है

मक्का में हुए समझौते से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका आने वाला असर होगा। भारत को देखना होगा कि पाकिस्तान को इससे किस स्तर की सैन्य, खुफिया और रणनीतिक पहुंच मिलती है, तुर्की के साथ उसका सुरक्षा सहयोग किस दिशा में जाता है और खाड़ी क्षेत्र में भारत-विरोधी संगठनों की फंडिंग रोकने वाली व्यवस्था कितनी मजबूत बनी रहती है। फिलहाल खतरे का कोई सीधा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन पुराने अनुभव बताते हैं कि इस मोर्चे पर लापरवाही की गुंजाइश भी नहीं है।

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