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सावरकर पर राहुल गांधी की टिप्पणी का केस ही ढहा: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा—सरकार की मंजूरी कहां है? समन और शिकायत दोनों रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी अभियोजन मंजूरी नहीं होने के कारण राहुल गांधी के खिलाफ लखनऊ की शिकायत और समन रद्द कर दिए।लोकस्वामी ग्राफिक्स
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सावरकर पर राहुल गांधी की टिप्पणी का केस ही ढहा: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा—सरकार की मंजूरी कहां है? समन और शिकायत दोनों रद्द

Digital News Desk3 min read14/08/26

सुप्रीम कोर्ट ने वीर सावरकर पर टिप्पणी से जुड़े लखनऊ केस में राहुल गांधी को बड़ी राहत दी है। यूपी सरकार की जरूरी अभियोजन मंजूरी का रिकॉर्ड नहीं मिलने पर शिकायत और मजिस्ट्रेट के समन दोनों रद्द कर दिए गए।

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नई दिल्ली। जिस सावरकर बयान को लेकर राहुल गांधी को लखनऊ की अदालत में आरोपी बनाकर बुलाया गया था, वही मामला शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में एक कानूनी कमी पर टिक नहीं सका। शीर्ष अदालत ने सबसे सीधा सवाल पूछा—ऐसे अपराध में मुकदमा चलाने के लिए यूपी सरकार की जरूरी मंजूरी कहां है? जवाब मिला, रिकॉर्ड में ऐसी कोई मंजूरी नहीं है। इसके बाद जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने निजी शिकायत के साथ मजिस्ट्रेट के समन और उससे जुड़े आदेशों को ही रद्द कर दिया।

राहुल को राहत बयान सही मानकर नहीं, कानूनी प्रक्रिया टूटने पर मिली

यह फर्क समझना सबसे जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी की 2022 वाली टिप्पणी को सही या गलत घोषित करके मामला खत्म नहीं किया। अदालत ने पाया कि IPC की धारा 153A जैसे आरोप पर संज्ञान लेने के लिए CrPC की धारा 196 के तहत राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी जरूरी थी, लेकिन यूपी सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में ऐसी sanction का कोई रिकॉर्ड नहीं था। इसी कानूनी कमी ने पूरी कार्यवाही की नींव हिला दी।

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से भी अदालत को बताया गया कि अभियोजन की मंजूरी उपलब्ध नहीं है। शिकायतकर्ता की ओर से मामला वापस मजिस्ट्रेट के पास भेजने की मांग हुई, लेकिन पीठ ने शिकायत और मजिस्ट्रेट के आदेशों को ही समाप्त कर दिया।

तीन साल पुराना बयान कैसे पहुंचा सुप्रीम कोर्ट तक?

मामला 17 नवंबर 2022 का है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान महाराष्ट्र के अकोला जिले में राहुल गांधी ने विनायक दामोदर सावरकर को लेकर टिप्पणी की थी। शिकायतकर्ता अधिवक्ता नृपेंद्र पांडे ने आरोप लगाया कि बयान से सावरकर का अपमान हुआ और समाज में वैमनस्य फैलाने की कोशिश की गई। इसके बाद लखनऊ की अदालत ने राहुल गांधी को IPC की धारा 153A और 505 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी किया था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। अब उसी मुकदमे की मूल शिकायत और समन दोनों खत्म हो गए हैं।

दिलचस्प मोड़—जिस कोर्ट ने फटकार लगाई थी, उसी ने अब केस खत्म किया

इस मामले का सबसे दिलचस्प हिस्सा अप्रैल 2025 की सुनवाई है। तब सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को सावरकर और स्वतंत्रता सेनानियों को लेकर गैर-जिम्मेदार टिप्पणी न करने की कड़ी चेतावनी दी थी। अदालत ने यह तक कहा था कि भविष्य में ऐसी टिप्पणी दोहराई गई तो स्वतः संज्ञान की कार्रवाई पर विचार हो सकता है। हालांकि उसी समय ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक भी लगा दी गई थी।

यानी अदालत का रुख दो अलग स्तरों पर साफ रहा—बयान की भाषा पर नाराजगी अपनी जगह, लेकिन आपराधिक मुकदमा कानूनी प्रक्रिया के बिना नहीं चल सकता।

‘निचली अदालत का फैसला पलटा’ कहना थोड़ा अधूरा क्यों है?

तकनीकी रूप से यहां कोई अंतिम दोषसिद्धि वाला “फैसला” नहीं पलटा गया। लखनऊ की अदालत ने राहुल गांधी को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब उस समन, शिकायत और मजिस्ट्रेट के संबंधित आदेशों को रद्द किया है। इसलिए इसे “दोषमुक्त” या “सावरकर बयान पर क्लीन चिट” कहना भी सही नहीं होगा।

अब इस केस में राहुल गांधी को अदालत के चक्कर नहीं लगाने होंगे

इस आदेश के साथ लखनऊ में चल रही यह विशेष आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई है। हालांकि राहुल गांधी के खिलाफ सावरकर से जुड़े दूसरे मामलों की स्थिति अलग हो सकती है; पुणे का एक अलग मानहानि मामला अभी चल रहा है। इसलिए शुक्रवार की राहत को सभी सावरकर मामलों का अंत नहीं समझना चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है—राजनीतिक बयान कितना भी विवादित क्यों न हो, आपराधिक मुकदमे की हर सीढ़ी कानून के मुताबिक चढ़नी होगी। मंजूरी ही नहीं थी, तो समन की इमारत टिकती कैसे?

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