
संसद के दो शब्द अब प्रियंका गांधी के पीछे पड़े! ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ टिप्पणी पर ऑनलाइन मुहिम, IIT डायरेक्टर के समर्थन में अकादमिक जगत
IIT मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी को संसद में ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ कहने के बाद प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर विवाद थम नहीं रहा। पहले 200 से ज्यादा शिक्षाविदों ने आपत्ति जताई और अब ऑनलाइन पिटीशन के जरिए टिप्पणी वापस लेने व खेद जताने की मांग उठी है।

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नई दिल्ली। संसद में कही गई एक चुटीली टिप्पणी अब कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा का पीछा कर रही है। निशाने पर थे IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रो. वी. कामकोटी और शब्द थे—‘गोमूत्र एक्सपर्ट’। उस वक्त यह राजनीतिक तंज था, लेकिन संसद से बाहर निकलते-निकलते मामला वैज्ञानिक और अकादमिक बिरादरी के सम्मान की बहस में बदल गया। पहले 215 कुलपति, पूर्व कुलपति, वैज्ञानिक और शिक्षाविद सामने आए, अब ऑनलाइन पिटीशन के जरिए लोकसभा अध्यक्ष तक बात पहुंचाने की मांग उठ रही है।
तंज दो शब्द का था, विवाद कई दिनों का हो गया
विवाद की शुरुआत लोकसभा में शिक्षा और परीक्षा सुधारों पर चर्चा के दौरान हुई। सरकार की नई टास्क फोर्स की बनावट पर सवाल उठाते हुए प्रियंका गांधी ने इसके सदस्यों का जिक्र किया और प्रो. कामकोटी की ओर संकेत करते हुए ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ शब्द इस्तेमाल किया। सवाल टास्क फोर्स में उनकी भूमिका को लेकर था, लेकिन कामकोटी के समर्थकों को तरीका व्यक्तिगत उपहास जैसा लगा।
अब इसी टिप्पणी के खिलाफ ऑनलाइन अभियान चल रहा है। वेबसाइट के मुताबिक Change.org पर 1 अगस्त से शुरू पिटीशन में 14 हजार से ज्यादा हस्ताक्षर होने का दावा है और आयोजकों का कहना है कि इसे 38 से अधिक देशों में मौजूद भारतीय वैज्ञानिकों का समर्थन मिला है। पिटीशन में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मामले का संज्ञान लेने तथा प्रियंका गांधी से टिप्पणी वापस लेकर खेद जताने की मांग की गई है।
लेकिन कामकोटी को ‘गोमूत्र’ से जोड़ा ही क्यों गया?
यही इस पूरे विवाद की दूसरी कहानी है। जनवरी 2025 में प्रो. कामकोटी का एक वीडियो चर्चा में आया था, जिसमें उन्होंने गोमूत्र के एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुणों की बात की थी और इसके स्वास्थ्य संबंधी उपयोग को लेकर दावे किए थे। इसी पुराने बयान के कारण उनका नाम गोमूत्र की बहस से जुड़ा और बाद में प्रियंका गांधी ने संसद में उसी संदर्भ को राजनीतिक तंज में बदल दिया।
इसलिए विवाद को केवल एक तरफ से पढ़ना अधूरा होगा। कामकोटी के स्वास्थ्य संबंधी दावों की वैज्ञानिक वैधता पर सवाल उठाना एक अलग बहस है; उनके पूरे वैज्ञानिक करियर को दो शब्दों में समेटकर मजाक बनाना उचित था या नहीं—अब विवाद इस दूसरे सवाल पर पहुंच गया है।
जिन्हें ‘गोमूत्र एक्सपर्ट’ कहा, उनका असली काम क्या है?
प्रो. वी. कामकोटी मूल रूप से कंप्यूटर साइंटिस्ट हैं। उन्होंने IIT मद्रास से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में MS और PhD की है। उनका प्रमुख काम कंप्यूटर आर्किटेक्चर, इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी और VLSI डिजाइन में रहा है। वह स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर विकास से जुड़े SHAKTI प्रोजेक्ट के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। उनके 150 से ज्यादा शोधपत्र प्रकाशित होने और लगभग 50 उद्योग तथा सरकारी R&D परियोजनाओं से जुड़े रहने का उल्लेख भी उनके अकादमिक रिकॉर्ड में मिलता है।
यही प्रोफाइल अब उनके समर्थकों की सबसे बड़ी दलील बन गई है—क्या दशकों के वैज्ञानिक काम वाले व्यक्ति की पहचान संसद में केवल उसके एक विवादित बयान से तय की जानी चाहिए?
पहले 215 शिक्षाविदों ने खोला था मोर्चा
ऑनलाइन पिटीशन से पहले 215 कुलपतियों, पूर्व कुलपतियों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए खुला पत्र लिखा था। उनका तर्क था कि असहमति और वैज्ञानिक आलोचना होनी चाहिए, लेकिन किसी विद्वान को एक लेबल देकर खारिज करना तार्किक बहस का विकल्प नहीं हो सकता।
यहीं से मामला राजनीति बनाम विज्ञान से आगे बढ़कर संसद की भाषा बनाम अकादमिक गरिमा की बहस में बदल गया।
अब असली सवाल गोमूत्र नहीं, सार्वजनिक बहस की भाषा का है
प्रियंका गांधी को प्रो. कामकोटी के पुराने दावों पर सवाल उठाने का राजनीतिक अधिकार है और वैज्ञानिक दावे आलोचना से ऊपर नहीं होते। उसी तरह वैज्ञानिक समुदाय को यह पूछने का अधिकार है कि किसी व्यक्ति के दशकों के काम को व्यंग्य के एक लेबल में बदल देना कहां तक उचित है।
इसलिए यह विवाद अब किसी एक शब्द पर अटका मामला नहीं रहा। एक तरफ वैज्ञानिक दावों की कसौटी है, दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन में आलोचना की मर्यादा। कामकोटी के दावे सही थे या गलत—उसका जवाब विज्ञान देगा; लेकिन संसद में उन्हें किस भाषा में चुनौती दी जाए—उसका जवाब राजनीति को देना है।


