
14 अगस्त की शाम कैलाश ने नेहरू पर खोली पुरानी फाइल: बोले—आजादी मिली, लेकिन तैयारी अधूरी थी और कीमत लाखों ने चुकाई
विभाजन विभीषिका दिवस पर इंदौर में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने 1947 के बंटवारे को लेकर तत्कालीन नेतृत्व पर सवाल उठाए। उन्होंने नेहरू पर जल्दबाजी का आरोप लगाते हुए विस्थापन और पुनर्वास की तैयारियों को निशाने पर लिया।

Audio tools for this article
इंदौर। 15 अगस्त की रोशनी से ठीक एक दिन पहले कैलाश विजयवर्गीय ने देश को 1947 के उस अंधेरे पन्ने की याद दिलाई, जिसमें आजादी के साथ बंटवारे की चीखें भी दर्ज हैं। इंदौर में विभाजन विभीषिका दिवस के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सीधे जवाहरलाल नेहरू के फैसलों पर सवाल उठाए और कहा कि देश का विभाजन जल्दबाजी में हुआ, जबकि उसके बाद पैदा होने वाले विस्थापन और मानवीय संकट की तैयारी पर्याप्त नहीं थी।
‘आजादी सिर्फ जश्न नहीं थी, उसके पीछे उजड़े घर भी थे’
विजयवर्गीय ने कहा कि आज की पीढ़ी जब स्वतंत्रता का उत्सव मनाती है, तो उसे यह भी जानना चाहिए कि इसी दौर में लाखों परिवारों ने अपना घर, जमीन और पूरा जीवन पीछे छोड़ दिया था। उनका कहना था कि विभाजन के दौरान हिंसा, पलायन और असुरक्षा ने ऐसी मानवीय त्रासदी पैदा की, जिसकी स्मृति को केवल इतिहास की किताबों में बंद नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2021 की घोषणा का उल्लेख करते हुए कहा कि 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका दिवस मनाने का उद्देश्य उसी पीड़ा, संघर्ष और विस्थापन को याद रखना है।
नेहरू पर सीधा आरोप—फैसला हुआ, लेकिन बाद की तैयारी कहां थी?
मंत्री का सबसे तीखा हमला तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर रहा। विजयवर्गीय ने आरोप लगाया कि विभाजन का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया और इतनी बड़ी आबादी के विस्थापन का अनुमान होने के बावजूद पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई।
उनके मुताबिक सवाल केवल यह नहीं है कि बंटवारा क्यों हुआ, बल्कि यह भी है कि उस फैसले के बाद सीमा के दोनों तरफ फंसे लोगों की सुरक्षा, बसाहट और भविष्य को लेकर क्या तैयारी की गई थी।
यह विजयवर्गीय का राजनीतिक आकलन है; भारत विभाजन के कारणों और जिम्मेदारियों को लेकर इतिहासकारों के बीच लंबे समय से अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं।
विजयवर्गीय ने पाकिस्तान में हुई हिंसा का भी किया जिक्र
अपने संबोधन में उन्होंने विभाजन के दौरान पाकिस्तान के हिस्से में आए क्षेत्रों में हिंदुओं और महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा का उल्लेख किया। उनका कहना था कि विस्थापन केवल भूगोल बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि लोगों ने परिवार, संपत्ति और जीवन तक गंवाए।
इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि ऐसी त्रासदियों को याद रखने का मकसद पुराने जख्म कुरेदना नहीं, बल्कि यह समझना होना चाहिए कि राजनीतिक फैसलों की मानवीय कीमत कितनी बड़ी हो सकती है।
इतिहास से बहस राजनीति तक पहुंची
विजयवर्गीय ने अपने भाषण को केवल 1947 तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने वर्तमान राजनीति में तुष्टीकरण का मुद्दा उठाते हुए कहा कि देश को अतीत से सबक लेकर ऐसी नीतियों से बचना चाहिए, जो समाज को बांटने का काम करें। उन्होंने विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ने की बात भी कही।
यहीं से यह कार्यक्रम सिर्फ स्मृति का आयोजन नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस और तत्कालीन नेतृत्व पर राजनीतिक हमला भी बन गया।
अब नजर कांग्रेस के जवाब पर
विभाजन का इतिहास भारतीय राजनीति में हमेशा संवेदनशील बहस का विषय रहा है। किसी एक नेता या एक फैसले में पूरी त्रासदी का कारण समेट देना इतिहास की जटिलता को छोटा कर सकता है, लेकिन विजयवर्गीय के बयान ने एक बार फिर वही पुराना सवाल सामने रख दिया है—क्या 1947 में सत्ता हस्तांतरण और विभाजन की प्रक्रिया इतनी तेज थी कि उसके मानवीय परिणामों की तैयारी पीछे छूट गई?
इंदौर से उठी यह टिप्पणी अब राजनीतिक प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही है। कांग्रेस जवाब देती है तो बहस केवल इतिहास पर नहीं, इतिहास की जिम्मेदारी तय करने पर भी जाएगी।


