‘हिजाब पर फैसला देने वाले आप कौन?’ ओवैसी ने HC पर उठाए सवाल, बोले- ‘मेरा मजहब हम तय करेंगे’
इलाहाबाद हाई कोर्ट के हिजाब से जुड़े फैसले पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि अदालत को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि इस्लाम में क्या जरूरी है। ओवैसी ने फैसले को संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 से जोड़ते हुए इसे गलत बताया।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट के हिजाब से जुड़े फैसले ने अब सियासी बहस का रूप ले लिया है। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के धार्मिक पहनावे को लेकर फैसला सुनाते समय अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि किसी धर्म में क्या जरूरी है और क्या नहीं।
ओवैसी ने मंगलवार को हैदराबाद स्थित अपनी पार्टी के मुख्यालय दारुस्सलाम में एक कार्यक्रम के दौरान इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं हैं और इसे संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
‘हाई कोर्ट होता कौन है यह तय करने वाला?’
ओवैसी ने कहा कि हिजाब पहनना उनके लिए धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत अधिकार का विषय है। उन्होंने सवाल उठाया कि अदालत यह कैसे तय कर सकती है कि इस्लाम में कौन-सी चीज जरूरी है और कौन-सी नहीं।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक आस्था और निजी पसंद के मामलों में व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
ओवैसी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवालों पर सुनवाई चल रही है, इसलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट को अपने फैसले को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए थी।
‘यह फैसला इस्लाम पर हमला है’
AIMIM प्रमुख ने हाई कोर्ट के फैसले को लेकर और तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा पहले से ही चुनौतीपूर्ण स्थिति में है और ऐसे फैसलों से उनकी पढ़ाई पर असर पड़ सकता है।
ओवैसी ने कहा कि धार्मिक मामलों में क्या जरूरी है, यह संबंधित समुदाय की आस्था से जुड़ा विषय है। उन्होंने इसी आधार पर अदालत के फैसले को गलत बताया और इसे इस्लाम पर हमला करार दिया।
ओवैसी की टिप्पणी पर बढ़ सकता है सियासी विवाद
हिजाब का मुद्दा लंबे समय से देश में शिक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और ड्रेस कोड को लेकर बहस का विषय रहा है। ऐसे में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर ओवैसी की प्रतिक्रिया के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने के आसार हैं।
हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने फैसले में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को खत्म करने की बात नहीं कही है। अदालत के सामने मुख्य सवाल स्कूल की यूनिफॉर्म और उसके साथ हिजाब पहनने की मांग से जुड़ा था।
आखिर हाई कोर्ट ने हिजाब पर क्या कहा?
मामला प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की 11वीं कक्षा की एक मुस्लिम छात्रा की याचिका से जुड़ा था। छात्रा ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी।
उसकी दलील थी कि हिजाब पहनना इस्लाम की जरूरी धार्मिक प्रथा है और इसे रोकना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सकी कि हिजाब पहनना मुस्लिम आस्था का अनिवार्य हिस्सा है।
कोर्ट ने यूनिफॉर्म को भी माना अहम
अदालत ने अपने फैसले में स्कूल की यूनिफॉर्म के उद्देश्य पर भी जोर दिया। कोर्ट के मुताबिक, यदि किसी एक छात्र को तय ड्रेस कोड से अलग पहनावे की अनुमति दी जाती है तो यूनिफॉर्म लागू करने का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
छात्रा की ओर से यह भी कहा गया था कि वह छठी कक्षा से स्कूल में हिजाब पहनती आ रही थी और पहले उसे इस पर रोका नहीं गया था। अदालत ने माना कि पहले किसी आपत्ति का सामने न आना अपने आप में यूनिफॉर्म नियमों से अलग पहनावे का स्थायी अधिकार नहीं देता।
इस फैसले के बाद अब ओवैसी की प्रतिक्रिया ने मामले को अदालत से निकलकर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
