नेपाल में फिर उठी हिंदू राष्ट्र की मांग: पूर्व पीएम देउबा बोले- ‘सनातन धर्म ही बने देश की पहचान’
नेपाल को दोबारा 'हिंदू राष्ट्र' घोषित करने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है. नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के गुट के तीन दिवसीय सम्मेलन में सनातन धर्म को देश की मुख्य राष्ट्रीय पहचान बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया. पूर्व पीएम देउबा ने कहा कि उन्हें 'मैं हिंदू हूं' कहने का पूरा अधिकार है.

Audio tools for this article
काठमांडू: नेपाल में धर्मनिरपेक्षता के ढांचे के बीच देश को फिर से 'हिंदू राष्ट्र' के रूप में स्थापित करने की राजनीतिक व सामाजिक मुहिम ने जोर पकड़ लिया है. नेपाली कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के गुट द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन पर देश की धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान को लेकर एक बड़ा प्रस्ताव पारित किया गया. इस घटनाक्रम के बाद नेपाल के सियासी गलियारों में बहस छिड़ गई है.
'सनातन धर्म बने नेपाल की पहचान', सम्मेलन में प्रस्ताव पारित
नेपाली कांग्रेस के देउबा गुट के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "मैं हिंदू हूं और सनातन धर्म ही नेपाल की वास्तविक पहचान होना चाहिए." देउबा ने साफ किया कि वे किसी अन्य धर्म या समुदाय के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक पहचान 'मैं हिंदू हूं' के साथ गर्व से व्यक्त करने का पूरा अधिकार है.
सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में यह रेखांकित किया गया कि नेपाल की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाएं उसकी राष्ट्रीय पहचान का सबसे अहम हिस्सा हैं. प्रस्ताव में हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति-आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण के साथ-साथ सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता, सामाजिक सद्भाव और आपसी सहिष्णुता बनाए रखने पर जोर दिया गया.
सांप्रदायिक तनाव के बाद तेज हुई मांग, संविधान संशोधन की सिफारिश
हाल के दिनों में नेपाल के मधेश और तराई क्षेत्रों, विशेषकर सुनसरी जिले में हुई सांप्रदायिक घटनाओं के बाद देश को पुनः हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग को नया बल मिला है.
सम्मेलन के दौरान नेपाल के वर्तमान संविधान का जिक्र करते हुए कहा गया कि मौजूदा संवैधानिक ढांचे में आम जनता की भावनाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए. हालांकि, गुट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान में कोई भी बदलाव या संशोधन सभी संबंधित पक्षों और राजनीतिक समूहों के साथ व्यापक संवाद के माध्यम से ही होना चाहिए.


