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iPhone नाम Apple का था ही नहीं, फिर दुनिया का सबसे मशहूर फोन कैसे बना? ₹142 करोड़ का मॉडल और 2007 से 2026 तक की पूरी कहानी
2007 में लॉन्च हुए पहले iPhone से लेकर नए दौर के Apple तक की तकनीकी यात्रा।लोकस्वामी ग्राफिक्स
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iPhone नाम Apple का था ही नहीं, फिर दुनिया का सबसे मशहूर फोन कैसे बना? ₹142 करोड़ का मॉडल और 2007 से 2026 तक की पूरी कहानी

Digital News Desk8 min read08/09/26

Apple के नए iPhone लॉन्च से पहले जानिए उस डिवाइस की कहानी, जिसने मोबाइल की परिभाषा बदल दी। iPhone नाम कभी Cisco के पास था, पहला मॉडल सिर्फ 74 दिन में 10 लाख बिका और करीब दो दशक में यह दुनिया के सबसे बड़े टेक प्रोडक्ट्स में शामिल हो गया। अब John Ternus के नेतृत्व में iPhone के सामने AI, मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन की नई चुनौतियां हैं।

Lokswami AI

9 जनवरी 2007 को सैन फ्रांसिस्को का मॉस्कोन सेंटर। मंच पर स्टीव जॉब्स खड़े थे और उनके हाथ में एक ऐसा डिवाइस था, जिसे उस वक्त शायद ज्यादातर लोग सिर्फ एक नया फोन समझ रहे थे। लेकिन जॉब्स इसे फोन से कहीं ज्यादा मानते थे।

उनके मुताबिक यह तीन चीजों का मेल था—मोबाइल फोन, टच वाला iPod और इंटरनेट कम्युनिकेशन डिवाइस।

यहीं से iPhone की कहानी शुरू हुई। करीब दो दशक बाद यही नाम Apple की पहचान बन चुका है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में iPhone नाम Apple के पास था ही नहीं।

और यही इस कहानी का पहला ट्विस्ट है।

iPhone नाम को लेकर Apple और Cisco आमने-सामने आ गए थे

iPhone नाम का ट्रेडमार्क पहले अमेरिकी नेटवर्किंग कंपनी Cisco के पास था। Cisco अपने Wi-Fi और VoIP तकनीक वाले फोन के लिए इस नाम का इस्तेमाल कर रही थी।

जब Apple ने 2007 में अपना iPhone पेश किया तो विवाद सीधे अदालत तक पहुंच गया। Cisco ने Apple के खिलाफ केस किया। बाद में दोनों कंपनियों के बीच समझौता हुआ और दोनों को iPhone नाम इस्तेमाल करने पर सहमति बनी।

नाम का विवाद खत्म हुआ, लेकिन Apple ने जिस तरह इस नाम को दुनिया भर में स्थापित किया, उसने इसे टेक्नोलॉजी की सबसे पहचानने योग्य ब्रांडिंग में बदल दिया।

2004 में शुरू हुआ था Apple का सबसे गुप्त प्रोजेक्ट

iPhone अचानक मंच पर नहीं आया था। इसके पीछे करीब ढाई साल की बेहद गोपनीय तैयारी थी।

2004-05 के दौरान Apple के कुछ चुनिंदा इंजीनियर अचानक अपने नियमित प्रोजेक्ट्स से गायब होने लगे। उनके सहयोगियों को भी यह पता नहीं था कि वे किस काम में लगाए गए हैं।

Apple ने कूपर्टीनो में एक अलग इमारत लेकर सीक्रेट लैब बनाई थी। यहां चुने गए इंजीनियर दिन-रात एक ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, जिसका कोडनेम ‘पर्पल’ था।

काम इतना गोपनीय था कि लैब के दरवाजे बंद रहते थे और प्रोजेक्ट से जुड़ी जानकारी बेहद सीमित लोगों तक थी। कई इंजीनियर घंटों नहीं, बल्कि दिन-रात इसी प्रोजेक्ट में लगे रहते थे।

2007 में जब जॉब्स ने iPhone दुनिया के सामने रखा, तब पता चला कि वर्षों से गायब नजर आ रहे इंजीनियर आखिर बना क्या रहे थे।

कीपैड हटाकर पूरी स्क्रीन को बना दिया कंट्रोल

उस दौर में Nokia और BlackBerry जैसे फोन बाजार पर मजबूत पकड़ रखते थे। फोन का मतलब था बटन, कीपैड और छोटी स्क्रीन।

Apple ने इस पूरी सोच को बदल दिया।

पहले iPhone में 3.5 इंच की टचस्क्रीन थी। इसमें फिजिकल कीपैड नहीं था। 2 मेगापिक्सल कैमरा, Wi-Fi, Bluetooth और इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ स्क्रीन ही फोन चलाने का मुख्य माध्यम बन गई।

टैप, स्वाइप और दो उंगलियों से स्क्रीन को बड़ा-छोटा करना—आज सामान्य लगने वाले ये इशारे उस समय मोबाइल इस्तेमाल करने के बिल्कुल नए तरीके थे।

4GB मॉडल 499 डॉलर और 8GB मॉडल 599 डॉलर में आया।

लेकिन असली बदलाव सिर्फ टचस्क्रीन नहीं था। Apple ने मोबाइल इंटरनेट को भी नया रूप दिया।

WAP की जगह मोबाइल पर दिखने लगी असली वेबसाइट

iPhone से पहले मोबाइल इंटरनेट का अनुभव काफी सीमित था। WAP पर वेबसाइट्स का स्वरूप कंप्यूटर वाली वेबसाइट जैसा नहीं होता था।

Apple ने Safari ब्राउजर के जरिए मोबाइल स्क्रीन पर वेबसाइट्स को ज्यादा वास्तविक तरीके से दिखाया। यानी फोन अब सिर्फ कॉल और मैसेज करने की मशीन नहीं रहा, बल्कि इंटरनेट तक पहुंचने वाला छोटा कंप्यूटर बन गया।

पहला iPhone जून 2007 में बाजार में आया और महज 74 दिनों में इसकी 10 लाख यूनिट बिक गईं।

यह आंकड़ा संकेत था कि Apple ने सिर्फ एक नया फोन नहीं बनाया था, बल्कि बाजार के इस्तेमाल का तरीका बदल दिया था।

तीन दिन में 10 लाख बिक्री, फिर आया App Store

पहले iPhone की एक बड़ी सीमा यह थी कि इसमें App Store नहीं था। यानी यूजर अपनी जरूरत के हिसाब से नए ऐप्स डाउनलोड नहीं कर सकता था।

2008 में iPhone 3G के साथ यह तस्वीर बदल गई। 3G और GPS के साथ App Store आया, जिसकी शुरुआत 800 से ज्यादा ऐप्स के साथ हुई।

इस बार 10 लाख यूनिट बेचने में 74 दिन नहीं लगे। iPhone 3G ने यह आंकड़ा सिर्फ तीन दिन में हासिल कर लिया।

अब iPhone सिर्फ एक डिवाइस नहीं था। डेवलपर्स के लिए यह एक प्लेटफॉर्म बन चुका था।

Retina Display ने फोन की स्क्रीन का स्तर बदल दिया

2010 में iPhone 4 आया और इसके साथ Retina Display पेश किया गया।

3.5 इंच की स्क्रीन में 960×640 पिक्सल और करीब 326 पिक्सल प्रति इंच की डेंसिटी थी। साथ में 5 मेगापिक्सल कैमरा, HD वीडियो रिकॉर्डिंग और FaceTime जैसे फीचर मिले।

बिक्री ने भी इसकी सफलता का संकेत दिया। लॉन्च के पहले तीन दिनों में 17 लाख से ज्यादा iPhone 4 बिक गए।

Jobs के बाद Cook ने iPhone को बड़े बाजार तक पहुंचाया

2011 में स्टीव जॉब्स ने CEO पद छोड़ा और कुछ समय बाद उनका निधन हो गया। कंपनी की कमान टिम कुक के हाथों में आई।

कुक के सामने चुनौती सिर्फ नया उत्पाद बनाना नहीं थी। Apple को अपनी सप्लाई चेन और उत्पादन क्षमता के साथ iPhone को दुनिया के ज्यादा बड़े बाजार तक पहुंचाना था।

2014 में iPhone 6 और iPhone 6 Plus के साथ Apple ने पहली बार बड़े स्क्रीन वाले मॉडल पेश किए। इसी दौर में Apple Pay भी आया।

बाजार की प्रतिक्रिया जबरदस्त रही। पहले तीन दिनों में दोनों मॉडलों की एक करोड़ से ज्यादा यूनिट बिक गईं।

इसके अगले साल iPhone 6s आया, जिसमें 3D Touch और Live Photos जैसे फीचर थे। इसकी भी पहले तीन दिनों में 1.3 करोड़ से ज्यादा यूनिट बिक गईं।

2017 में Apple ने अपनी ही पहचान हटा दी

iPhone की दसवीं सालगिरह पर Apple ने एक बड़ा फैसला लिया।

iPhone X में होम बटन हटा दिया गया। 5.8 इंच की OLED स्क्रीन ने फोन के फ्रंट को लगभग पूरी तरह बदल दिया। साथ में Face ID आया।

TrueDepth कैमरा चेहरे का 3D मैप तैयार करता था और फोन को देखने भर से उसे अनलॉक किया जा सकता था।

यहीं से iPhone का अगला बड़ा फोकस कैमरा और कम्प्यूटेशनल फोटोग्राफी बना।

2019 के iPhone 11 में Night Mode और Ultra Wide कैमरा आया। तस्वीर की गुणवत्ता सिर्फ लेंस पर निर्भर नहीं रही। प्रोसेसर और सॉफ्टवेयर भी तस्वीर तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाने लगे।

2020 के बाद iPhone में नेटवर्क से ज्यादा कंप्यूटिंग की दौड़ दिखी

2020 में iPhone 12 के साथ Apple ने 5G की दुनिया में कदम रखा। इसके साथ A14 Bionic चिप और 16-कोर Neural Engine आया।

अब फोन की ताकत सिर्फ तेज इंटरनेट तक सीमित नहीं थी। मशीन लर्निंग और AI से जुड़े कई काम डिवाइस पर ही करने की क्षमता बढ़ रही थी।

इसके बाद Apple ने iPhone को अलग-अलग मोर्चों पर आगे बढ़ाया।

2022 में iPhone 14 के साथ Emergency SOS via Satellite आया। मोबाइल नेटवर्क या Wi-Fi उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में सैटेलाइट के जरिए आपात संदेश भेजने की सुविधा दी गई। इसके लिए Apple ने सैटेलाइट इंफ्रास्ट्रक्चर में 45 करोड़ डॉलर का निवेश किया।

2023 में iPhone 15 के साथ Lightning पोर्ट हटाकर USB-C दिया गया। iPhone 15 Pro में Titanium बॉडी और A17 Pro चिप भी आई।

2024 में iPhone 16 के साथ Apple Intelligence पेश किया गया। A18 चिप और Camera Control जैसे फीचर भी इसमें शामिल रहे।

2025 में iPhone 17 लाइनअप में iPhone Air आया, जिसकी मोटाई 5.6 मिलीमीटर बताई गई। A19 Pro चिप और बड़ी स्क्रीन के साथ Apple ने पतले डिजाइन की दिशा में भी अपनी महत्वाकांक्षा दिखाई।

दुनिया का सबसे महंगा iPhone ₹142 करोड़ में बिका

iPhone की कहानी सिर्फ टेक्नोलॉजी और बिक्री के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसका एक बेहद महंगा कस्टम मॉडल भी दुनिया में चर्चा का विषय रहा है।

ब्रिटिश डिजाइनर Stuart Hughes ने एक iPhone को कस्टमाइज किया था, जिसकी कीमत करीब 1.5 करोड़ डॉलर यानी मौजूदा हिसाब से लगभग 142 करोड़ रुपए बताई गई।

इसमें 135 ग्राम 24 कैरेट सोना और 600 सफेद हीरे लगाए गए थे। होम बटन की जगह 24 कैरेट का काला हीरा इस्तेमाल किया गया था।

यह सामान्य बाजार में बिकने वाला iPhone नहीं था, बल्कि बेहद महंगा कस्टमाइज्ड मॉडल था।

करीब 8 साल में एक्टिव iPhone यूजर्स में बड़ी छलांग

iPhone की बिक्री का पैमाना भी इसकी यात्रा को समझने का एक अहम हिस्सा है।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में अब तक 300 करोड़ से ज्यादा iPhone बिक चुके हैं और इनमें 250 करोड़ से ज्यादा एक्टिव बताए जाते हैं। 2018 में एक्टिव iPhone की संख्या करीब 130 करोड़ थी।

यानी आठ साल के भीतर एक्टिव डिवाइस की संख्या में करीब 120 करोड़ की बढ़ोतरी हुई।

अब iPhone सिर्फ Apple का सबसे प्रमुख प्रोडक्ट नहीं, बल्कि कंपनी के पूरे इकोसिस्टम का केंद्र है।

अब iPhone की कमान John Ternus के दौर में

करीब दो दशक की इस यात्रा के बाद Apple अब नए नेतृत्व के दौर में पहुंच चुका है।

John Ternus 2001 में Apple से जुड़े थे। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने कंपनी में हार्डवेयर से जुड़े काम से शुरुआत की और आगे चलकर Apple की हार्डवेयर टीम के प्रमुख चेहरों में शामिल हुए।

उन्होंने Mac, iPhone, AirPods और दूसरे हार्डवेयर प्रोडक्ट्स पर काम किया है। 1 सितंबर 2026 को उन्हें Apple का CEO बनाया गया।

यानी Ternus ने Jobs का दौर भी देखा है और Tim Cook के साथ भी काम किया है। अब पहली बार उन्हें कंपनी की पूरी कमान संभालते हुए iPhone के अगले दौर की दिशा तय करनी होगी।

AI से लेकर चीन तक, Ternus के सामने चार बड़ी चुनौतियां

Ternus के लिए सबसे बड़ी चुनौती AI को लेकर है। Google और Microsoft जैसी कंपनियों के मुकाबले Apple की AI रणनीति को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। iPhone को AI की अगली लहर में मजबूत स्थिति दिलाना उनके लिए अहम होगा।

दूसरी चुनौती Apple के बिजनेस मॉडल से जुड़ी है। अमेरिका और यूरोप में कंपनी पर प्रतिस्पर्धा और एकाधिकार से जुड़े सवाल उठते रहे हैं।

तीसरा मुद्दा मैन्युफैक्चरिंग का है। अमेरिका-चीन तनाव के बीच उत्पादन को भारत और वियतनाम जैसे देशों में शिफ्ट करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना Apple के लिए रणनीतिक चुनौती है।

और चौथा सवाल सबसे बुनियादी है—क्या Apple अब भी वैसा ही बड़ा इनोवेशन कर सकता है, जैसा 2007 में iPhone ने किया था?

पहले iPhone ने फोन को कंप्यूटर जैसा बना दिया था। फिर App Store ने उसे प्लेटफॉर्म बनाया, कैमरे ने उसे क्रिएटिव टूल में बदला और AI ने उसे ज्यादा व्यक्तिगत बनाने की कोशिश शुरू की।

अब अगला बड़ा बदलाव क्या होगा, यही वह सवाल है जिसका जवाब Ternus के दौर का iPhone देगा।

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