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एक कमरे में तीन क्लास, कहीं दो-दो कक्षाएं साथ... खरगोन के देवली स्कूल में बच्चे पढ़ें या शोर से लड़ें?
देवली प्राथमिक-माध्यमिक शाला में पर्याप्त कमरों के अभाव में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक साथ बैठाकर पढ़ाया जा रहा है।लोकस्वामी ग्राफिक्स
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एक कमरे में तीन क्लास, कहीं दो-दो कक्षाएं साथ... खरगोन के देवली स्कूल में बच्चे पढ़ें या शोर से लड़ें?

Digital News DeskDigital News Desk2 min read13/08/26

खरगोन के देवली स्कूल में करीब 180 बच्चों के लिए पर्याप्त सुरक्षित कमरे नहीं हैं। हालत यह है कि चार कमरों में आठ कक्षाएं चल रही हैं और अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को साथ बैठाकर पढ़ाना पड़ रहा है।

Lokswami AI

खरगोन। ब्लैकबोर्ड एक है, कमरा एक है, लेकिन सामने बैठी कक्षाएं अलग-अलग। शिक्षक एक कक्षा को समझाते हैं तो उसी कमरे में बैठी दूसरी कक्षा के बच्चों के कानों तक भी वही आवाज पहुंचती है। खरगोन जिले की देवली प्राथमिक-माध्यमिक शाला में यह किसी एक दिन की मजबूरी नहीं, बल्कि पिछले करीब तीन साल से बच्चों की पढ़ाई का हिस्सा बन चुकी है। स्कूल भवन की हालत ऐसी है कि करीब 180 बच्चों की आठ कक्षाओं को महज चार कमरों में समेटना पड़ रहा है।

पहली, दूसरी और तीसरी... तीन कक्षाओं के 60 बच्चे एक कमरे में

सबसे ज्यादा दबाव छोटे बच्चों पर है। पहली से तीसरी तक के करीब 60 विद्यार्थियों को एक ही कमरे में बैठाया जा रहा है। यानी उम्र अलग, कक्षा अलग और पाठ्यक्रम अलग, लेकिन पढ़ने की जगह एक।

दूसरे कमरे में चौथी के 20 और पांचवीं के 19 विद्यार्थी साथ बैठते हैं। तीसरे कमरे में छठी के 28 और सातवीं के 25 बच्चों की पढ़ाई एक साथ चलती है। उपलब्ध कमरों की कमी ने स्कूल को ऐसी व्यवस्था बनाने पर मजबूर कर दिया है जिसमें एक ही समय पर अलग-अलग कक्षाओं को संभालना शिक्षकों के लिए भी चुनौती है।

एक तरफ शिक्षक पढ़ाते हैं, दूसरी तरफ वही आवाज बन जाती है शोर

समस्या सिर्फ बैठने की जगह की नहीं है। जब एक कमरे में दो या तीन कक्षाएं चलेंगी तो एक शिक्षक की पढ़ाई दूसरी कक्षा के लिए शोर बनना तय है। बच्चे किस आवाज पर ध्यान दें और शिक्षक किस कक्षा को पहले समझाएं—रोज की पढ़ाई इसी उलझन के बीच चल रही है।

सबसे बड़ा सवाल उस भवन की हालत पर है जिसकी वजह से यह स्थिति बनी। स्कूल की छत टपकने और प्लास्टर झड़ने जैसी समस्याओं के बीच बच्चों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि जर्जर हिस्सों का इस्तेमाल जोखिम भरा है तो विकल्प के तौर पर पर्याप्त सुरक्षित कमरे उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

तीन साल से इंतजार... बच्चों की पढ़ाई कब कमरे से बड़ी होगी?

करीब 180 बच्चों के लिए स्कूल सिर्फ एक इमारत नहीं, उनकी रोज की पढ़ाई की जगह है। लेकिन जब जगह ही पर्याप्त न हो तो इसका सीधा असर पढ़ाने और सीखने दोनों पर पड़ता है। यह व्यवस्था कुछ दिनों की होती तो इसे अस्थायी परेशानी कहा जा सकता था, लेकिन करीब तीन साल से हालात बने रहने से सवाल शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं तक पहुंचता है।

अब जरूरत सिर्फ जर्जर हिस्सों की मरम्मत की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि हर कक्षा को ऐसी सुरक्षित जगह मिले जहां बच्चे बिना शोर, डर और जगह की कमी के पढ़ सकें।

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