भागीरथपुरा कांड की जांच रिपोर्ट: शिकायतों से मौतों तक, सिस्टम की कौन-कौन सी चूक सामने आई; 22 मौतों को दूषित पानी से जोड़ा
हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड जांच रिपोर्ट में भागीरथपुरा जल संकट से जुड़े पुराने शिकायत रिकॉर्ड, पानी के नमूने, पाइपलाइन नेटवर्क और अधिकारियों की भूमिका का विस्तृत परीक्षण किया गया है। आयोग ने 36 मौतों में से 22 को दूषित पानी से संबंधित माना है।

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इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद हादसे के पीछे सिर्फ एक दिन की गलती नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थागत कमियां सामने आई हैं। हाई कोर्ट के आदेश पर गठित एक सदस्यीय आयोग ने पेयजल और सीवर नेटवर्क की बनावट से लेकर शिकायतों पर कार्रवाई, पानी की जांच, पाइप बदलने में देरी और अधिकारियों की निगरानी तक कई पहलुओं की पड़ताल की है। रिपोर्ट के मुताबिक कुल 36 मौतों में से 22 को दूषित पानी से जुड़ा पाया गया, जबकि बाकी मामलों में मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं हो सका।
बीमारी के संकेत पहले ही मिल चुके थे
जांच रिपोर्ट में दिसंबर के अंतिम सप्ताह की शुरुआत को अहम माना गया है। इसी दौरान भागीरथपुरा में उल्टी, दस्त और पेट दर्द जैसे लक्षणों वाले मरीज सामने आने लगे थे। स्थानीय स्तर पर बदबूदार और गंदे पानी की शिकायतें भी की जा रही थीं।
रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्रीय पार्षद कमल वाघेला ने भी अधिकारियों तक शिकायतों की जानकारी पहुंचाई थी। इसके बावजूद समय रहते ऐसी कार्रवाई नहीं हुई जिससे पानी की समस्या के मूल कारण का पता लगाया जा सके।
पानी की जांच ने सामने रखी गंभीर तस्वीर
3 जनवरी 2026 को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी के 52 नमूने लिए। इनमें 50 नमूनों में टोटल कोलीफार्म और 40 में ई-कोलाई की मौजूदगी मिली। रिपोर्ट के अनुसार पीने के पानी में इन बैक्टीरिया की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए।
इसके अलावा 29 दिसंबर से 6 फरवरी के बीच लिए गए 24 नमूनों में 18 असंतोषजनक पाए गए। एमजीएम मेडिकल कॉलेज की जांच में भी 24 में से 19 नमूने पीने योग्य नहीं मिले।
आयोग ने 2025 के नगर निगम रिकॉर्ड की भी समीक्षा की। उस साल जांचे गए 73 नमूनों में 54 मानकों पर खरे नहीं उतरे थे और 39 में फीकल कोलीफार्म मिला था।
अस्पतालों के रिकॉर्ड ने जोड़ी बीमारी और पानी की कड़ी
भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे थे।
चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के रिकॉर्ड में 38 बच्चों के भर्ती होने की जानकारी मिली। इनमें तीव्र गैस्ट्रोएंटेराइटिस, डिहाइड्रेशन और दस्त जैसे लक्षण दर्ज थे। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के रिकॉर्ड में 43 मरीजों के भर्ती होने और बाद में गैस्ट्रोएंटेराइटिस से पीड़ित पाए जाने का उल्लेख है।
आयोग के सामने डॉक्टरों ने भी मरीजों में एक जैसे लक्षण पाए जाने की जानकारी दी। रिपोर्ट में ई-कोलाई सहित रोगजनक बैक्टीरिया की मौजूदगी और दूषित पानी से गैस्ट्रोएंटेराइटिस होने की चिकित्सकीय संभावना को उपलब्ध साक्ष्यों से समर्थन मिलने की बात कही गई है।
असली खतरा पाइपलाइन के अंदर छिपा था
जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पेयजल और सीवर नेटवर्क की संरचना रही। रिपोर्ट में सामने आया कि कई स्थानों पर दोनों लाइनें एक-दूसरे के समानांतर चल रही थीं, कहीं क्रॉसिंग थी तो कुछ जगह ओवरलैप की स्थिति थी।
कुछ स्थानों पर सीवर लाइन पेयजल पाइप के ऊपर भी पाई गई। आयोग ने तकनीकी मानकों के अनुसार दोनों नेटवर्क के बीच पर्याप्त दूरी रखने और सीवर लाइन को पेयजल लाइन से नीचे रखने की जरूरत बताई है।
नगर निगम के इंजीनियरों ने भी निर्धारित दूरी का पालन नहीं होने की बात स्वीकार की। रिपोर्ट के अनुसार सीवर रिसाव और ओवरफ्लो के साथ पेयजल नेटवर्क में निगेटिव प्रेशर ने दूषित पानी को पाइपलाइन में पहुंचने का रास्ता बनाया।
पुरानी शिकायतें थीं, लेकिन निगरानी कमजोर रही
आयोग ने नेटवर्क के डिजाइन और रखरखाव से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की। रिपोर्ट में तत्कालीन अधिकारियों के जिम्मेदारियों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि जर्जर पाइप, लीकेज और नेटवर्क की स्थिति की निगरानी तथा नियमित रखरखाव जरूरी था।
जोन-4 और भागीरथपुरा क्षेत्र में जिम्मेदार रहे अधिकारियों के सामने लीकेज, पाइप क्षति, अनधिकृत कनेक्शन, सीवर-पेयजल लाइन की नजदीकी और पानी की गुणवत्ता जैसी शिकायतें आने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज है। आयोग ने इन शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं होने को जांच योग्य माना।
नई पाइपलाइन का काम भी समय पर पूरा नहीं हुआ
भागीरथपुरा की पाइपलाइन व्यवस्था सुधारने के लिए प्रस्तावित काम में भी लंबी प्रक्रिया सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक टेंडर जारी होने से लेकर एमआईसी तक मामला पहुंचने, स्वीकृति और अनुबंध की प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर देरी हुई।
नई पाइपलाइन का काम मई 2024 तक पूरा होना था, लेकिन यह करीब दो साल की देरी से पूरा हुआ। आयोग ने ठेकेदार एजेंसी मालवा इंजीनियरिंग और तत्कालीन कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव की निगरानी की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।
भविष्य के लिए आयोग ने सुझाए कई बदलाव
आयोग ने ऐसी स्थिति दोबारा न बने इसके लिए पेयजल और सीवर नेटवर्क के बीच पर्याप्त दूरी, क्रॉसिंग पर सुरक्षा व्यवस्था, GIS आधारित मैपिंग और पुराने पाइपों को चरणबद्ध तरीके से बदलने की सिफारिश की है।
इसके साथ ही नियमित सुरक्षा ऑडिट, लीकेज और प्रेशर की रियल टाइम निगरानी तथा पानी की नियमित बैक्टीरियोलॉजिकल जांच की व्यवस्था सुझाई गई है।
किसी इलाके से बदबूदार या संदिग्ध पानी की शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर सैंपल लेने, जांच कराने और जरूरत पड़ने पर प्रभावित पाइप या बोरवेल बंद करने की प्रक्रिया भी तय करने की सिफारिश की गई है। साथ में वैकल्पिक पानी, टैंकर, क्लोरीनेशन, मेडिकल टीम और लोगों को तत्काल सूचना देने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।
अलग जल प्राधिकरण बनाने की सिफारिश
आयोग ने शहरी जल आपूर्ति के लिए अलग प्राधिकरण गठित करने का सुझाव भी दिया है। रिपोर्ट में इसके अध्यक्ष पद के लिए सेवानिवृत्त हाई कोर्ट जज या मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी का विकल्प सुझाया गया है।
प्रभावित परिवारों के लिए भी आयोग ने कई राहत उपायों की अनुशंसा की है। इनमें मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपए, अंतिम संस्कार के लिए 50 हजार रुपए, बच्चों की शिक्षा के लिए 5 लाख रुपए तक की सहायता और अलग-अलग स्तर की बीमारी या स्थायी नुकसान के लिए आर्थिक मदद शामिल है।
आयोग ने प्रभावित परिवारों को पांच वर्ष तक मुफ्त चिकित्सा सुविधा और नियमित स्वास्थ्य शिविर उपलब्ध कराने की भी सिफारिश की है।
