भागीरथपुरा हादसे के बाद एक्शन में सरकार, रोबोट करेंगे पानी-सीवर लाइनों की जांच; 1.5 करोड़ होंगे खर्च
एक बड़े जल संकट के बाद मध्य प्रदेश अब भूमिगत पाइपलाइनों की स्थिति जांचने के लिए हाईटेक निगरानी का सहारा ले रहा है। बिना सड़क खोदे पाइप के भीतर कैमरा भेजकर रिसाव, टूट-फूट और दूसरे जोखिमों की पहचान की जाएगी।

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इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों ने शहरों की भूमिगत जल व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार ने प्रदेशभर में पानी और सीवर नेटवर्क के बीच मौजूद संभावित जोखिम वाले स्थानों की पड़ताल कराने का फैसला लिया है। GIS मैपिंग के जरिए ऐसे 2.30 लाख से ज्यादा क्रॉसिंग पॉइंट चिन्हित किए गए हैं, जहां दोनों तरह की लाइनें एक-दूसरे को पार कर रही हैं। अब इन स्थानों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए तकनीकी निरीक्षण कराया जाएगा।
इंदौर और भोपाल में सबसे ज्यादा संवेदनशील स्थान
सरकारी मैपिंग में इंदौर में 30 हजार से ज्यादा और भोपाल में 20 हजार से अधिक ऐसे स्थान सामने आए हैं। इन जगहों पर अगर किसी पाइप में रिसाव या टूट-फूट होती है तो सीवर का पानी पेयजल नेटवर्क तक पहुंचने का खतरा पैदा हो सकता है। भागीरथपुरा में सामने आए मामले के बाद सरकार ने अब केवल शिकायत के आधार पर खराबी खोजने के बजाय पहले से चिन्हित जोखिम वाले स्थानों की जांच कराने की व्यवस्था तैयार की है।
सड़क खोदे बिना पाइप के अंदर पहुंचेगा रोबोट
जांच के लिए CCTV क्रॉलर सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। मशीन को मौजूदा मैनहोल या एयर रिलीज वाल्व के रास्ते पाइपलाइन में डाला जाएगा, इसलिए सड़क या जमीन को बड़े स्तर पर खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसमें हाई रिजॉल्यूशन कैमरा और सेंसर लगे होंगे। करीब 300 मीटर लंबे केबल से जुड़ा रोबोट पाइप के भीतर जाकर लगातार वीडियो रिकॉर्ड करेगा और वहां की स्थिति से जुड़ा डेटा तैयार करेगा।
70 से 900 मिलीमीटर तक की पाइपलाइन में जांच
यह सिस्टम 70 से 900 मिलीमीटर व्यास वाली पाइपलाइनों में काम करने में सक्षम होगा। निरीक्षण के दौरान लीकेज, पाइप टूटने, अवैध कनेक्शन, जॉइंट की खराबी और पाइपलाइन के बैठने जैसी समस्याओं को चिन्हित किया जाएगा। इससे संबंधित नगरीय निकायों को यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस स्थान पर तत्काल मरम्मत की जरूरत है और कौन-से हिस्से नियमित निगरानी में रखे जाने चाहिए।
1.50 करोड़ के काम के लिए टेंडर
इस तकनीकी जांच के लिए विभाग ने टेंडर जारी किया था। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1.50 करोड़ रुपए रखी गई और इसे 365 दिनों में पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया। तीन कंपनियों ने इसमें हिस्सा लिया। डिजिटल सर्विलॉन्स ने 440 रुपए प्रति मीटर, फॉर्म डील ने 400 रुपए प्रति मीटर और चेन्नई की पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज ने 40 रुपए प्रति मीटर की दर पेश की। सबसे कम बोली के आधार पर पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज को काम दिया गया है।
अब हर निकाय अपनी जरूरत के हिसाब से आगे बढ़ेगा
कंपनी को काम सौंपे जाने के बाद प्रदेश के अलग-अलग नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद अपने क्षेत्र के चिन्हित स्थानों के आधार पर एस्टीमेट तैयार करेंगे। इसके बाद संबंधित क्षेत्र में जांच के लिए वर्क ऑर्डर जारी किया जाएगा। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने सभी संबंधित निकायों को इस प्रक्रिया के तहत काम करने के निर्देश दिए हैं।
खराबी मिलने पर रिपोर्ट की भी समय सीमा तय
जांच में सामने आने वाली समस्याओं को उनकी गंभीरता के अनुसार तीन श्रेणियों में बांटा गया है। गंभीर लीकेज, अवैध टैपिंग और पाइपलाइन बैठने जैसी समस्या को क्रिटिकल श्रेणी में रखा गया है, जिसकी जानकारी 48 घंटे में देनी होगी। सामान्य लीकेज, जॉइंट खिसकने या पाइप का आकार बिगड़ने जैसी समस्या मेजर श्रेणी में आएगी और इसकी रिपोर्ट तीन दिन में देनी होगी। पाइप के अंदर जमा गंदगी या मामूली तलछट जैसी समस्या माइनर श्रेणी में होगी, जिसे मासिक रिपोर्ट में दर्ज किया जाएगा।
पुराने तरीके में सड़क और ट्रैफिक दोनों प्रभावित होते थे
पाइपलाइन की जांच के पारंपरिक तरीके में कई बार सड़क और जमीन की खुदाई करनी पड़ती थी। इससे यातायात प्रभावित होने के साथ आसपास के कारोबार और लोगों की आवाजाही पर भी असर पड़ता था। खुदाई के दौरान बिजली, गैस और दूसरी भूमिगत सेवाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा भी रहता था। घनी आबादी वाले इलाकों में यह प्रक्रिया और कठिन हो जाती थी। रोबोटिक निरीक्षण से पाइप के भीतर से स्थिति देखने की सुविधा मिलेगी, जिससे ऐसी खुदाई की जरूरत कम होने की उम्मीद है।
देश के कई राज्यों में पहले से इस्तेमाल हो रही तकनीक
मध्य प्रदेश में इस तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल पहली बार किया जा रहा है, लेकिन देश के कई राज्यों में रोबोटिक पाइपलाइन निरीक्षण पहले से किया जा रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट में 15 से अधिक राज्यों में इस तरह की तकनीक के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है। तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में भूमिगत पाइपलाइनों की जांच के लिए रोबोटिक सिस्टम का इस्तेमाल होने की जानकारी दी गई है।
भागीरथपुरा में पहले से मिल रही थीं शिकायतें
भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या अचानक सामने नहीं आई थी। दिसंबर 2025 के दौरान इलाके में पानी को लेकर शिकायतें बढ़ने लगी थीं। 24 दिसंबर के आसपास उल्टी-दस्त के मरीज सामने आने लगे और अगले कुछ दिनों में स्थिति तेजी से बिगड़ी। स्वास्थ्य विभाग ने सर्वे शुरू किया और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने की जानकारी सामने आई। बाद की जांच में पेयजल और सीवर नेटवर्क के बीच लीकेज से जुड़े सवाल उठे।
हादसे में 36 मौतों के बाद बढ़ा दबाव
भागीरथपुरा मामले में कुल 36 लोगों की मौत हुई। जांच के दौरान पानी में मानव मल से जुड़े बैक्टीरिया मिलने की बात सामने आई और सीवर लाइन के रिसाव से पेयजल के दूषित होने की आशंका पर जांच आगे बढ़ी। इस घटना के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई हुई और जल व्यवस्था की निगरानी को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ा।
अधिकारियों पर हुई कार्रवाई, हाईकोर्ट में भी मामला
31 दिसंबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भागीरथपुरा पहुंचकर प्रभावित परिवारों से मुलाकात की थी। इसके बाद नगर निगम आयुक्त को हटाया गया और अतिरिक्त आयुक्त तथा एक कार्यपालन यंत्री के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई। मामले को लेकर हाईकोर्ट में भी सुनवाई हुई। 25 अगस्त 2026 को अदालत में 600 से ज्यादा पन्नों की जांच रिपोर्ट पेश किए जाने की जानकारी सामने आई।
अब चुनौती सिर्फ जांच नहीं, सुधार की भी
सरकार की नई व्यवस्था से संभावित खतरे वाले स्थानों की जानकारी तकनीकी तरीके से मिलने की उम्मीद है, लेकिन इसके बाद सबसे अहम कदम उन खराबियों को समय पर ठीक करना होगा। लाखों क्रॉसिंग पॉइंट्स की जांच के बाद यदि गंभीर लीकेज या अवैध कनेक्शन सामने आते हैं, तो संबंधित नगरीय निकायों के लिए उन्हें तय समय में दुरुस्त करना बड़ी चुनौती होगी। भागीरथपुरा जैसे हादसे की पुनरावृत्ति रोकने में इस पूरी प्रक्रिया की वास्तविक प्रभावशीलता इसी पर निर्भर करेगी।