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राष्ट्रपति भवन में राखी की वो परंपरा, जहां राजेंद्र प्रसाद से कलाम तक जुड़ीं बेटियों की यादें
राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन की परंपरा देश के कई राष्ट्रपतियों के कार्यकाल से जुड़ी रही है।लोकस्वामी ग्राफिक्स
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राष्ट्रपति भवन में राखी का वो अनसुना इतिहास, जब बच्चों के बीच बैठते थे राजेंद्र प्रसाद और कलाम पूछते थे सपनों के सवाल

Digital News Desk4 min read27/08/26

रक्षाबंधन पर जब देश के राष्ट्रपति राखी बंधवाते हैं तो यह सिर्फ एक औपचारिक तस्वीर नहीं होती। राष्ट्रपति भवन में इस परंपरा की जड़ें देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दौर तक जाती हैं। कभी बच्चों को उपहार देने वाली राजवंशी देवी, कभी राधाकृष्णन का अमृत उद्यान और कभी एपीजे अब्दुल कलाम के बच्चों से पूछे गए सवाल… राष्ट्रपति भवन की राखी की कहानी बेहद खास है।

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राष्ट्रपति भवन को देश की सत्ता और संवैधानिक गरिमा के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी भव्य इमारत में रक्षाबंधन की एक ऐसी परंपरा भी रही है, जिसका रिश्ता सिर्फ राष्ट्रपति से नहीं बल्कि देश की बेटियों और बच्चों से जुड़ा रहा है?

यह कहानी किसी एक साल या किसी एक राष्ट्रपति की नहीं है। इसकी शुरुआत देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दौर से जुड़ती है और फिर अलग-अलग राष्ट्रपतियों के साथ इसका अंदाज बदलता गया। कभी राष्ट्रपति भवन में स्कूल की बच्चियां राखी बांधने पहुंचीं, कभी कर्मचारियों की बेटियां इस आयोजन का हिस्सा बनीं और कभी राष्ट्रपति ने बच्चों से उनके सपनों और रुचियों के बारे में बातचीत की।

इस पूरी परंपरा की सबसे दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपति भवन में राखी सिर्फ बांधी नहीं जाती थी, बल्कि इस मौके पर राष्ट्रपति और बच्चों के बीच एक पारिवारिक रिश्ता भी दिखाई देता था।

राजेंद्र प्रसाद के दौर में राष्ट्रपति भवन बन जाता था ‘बड़ा परिवार’

104 साल की सुभद्रा देवी की यादों में राष्ट्रपति भवन का वह दौर आज भी जिंदा है। कुछ साल पहले तक वह बड़े उत्साह से बताया करती थीं कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समय रक्षाबंधन किस तरह मनाया जाता था।

1950 के दशक में सरोजिनी नगर और नेताजी नगर की महिलाएं और लड़कियां राष्ट्रपति को राखी बांधने राष्ट्रपति भवन पहुंचती थीं। नई दिल्ली के कई स्कूलों की छात्राएं भी इस आयोजन में शामिल होती थीं।

लेकिन कहानी सिर्फ राष्ट्रपति तक सीमित नहीं थी।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पत्नी राजवंशी देवी प्रसाद आने वाली महिलाओं और बच्चियों का स्वागत करती थीं। राष्ट्रपति सभी को उपहार देते थे। कुछ समय बच्चों के बीच रहने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद वहां से चले जाते, लेकिन राजवंशी देवी वहीं रुककर लोगों से बातचीत करती रहती थीं।

बच्चे उन्हें प्यार से ‘मां जी’ कहते थे।

यही वजह थी कि उस दौर की यादों में राष्ट्रपति भवन सिर्फ एक सरकारी निवास नहीं, बल्कि एक बड़े परिवार जैसा नजर आता है।

राधाकृष्णन के दौर में अमृत उद्यान बना राखी का ठिकाना

समय बदला और राष्ट्रपति बदले, लेकिन राखी की यह परंपरा खत्म नहीं हुई।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के दौर में रक्षाबंधन का आयोजन अमृत उद्यान में किया जाता था। उस समय इसे मुगल गार्डन के नाम से जाना जाता था।

डॉ. जाकिर हुसैन भी स्कूली छात्राओं और राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों की बेटियों से राखी बंधवाते थे। खास बात यह थी कि वह केवल औपचारिक रूप से राखी बंधवाकर आगे नहीं बढ़ जाते थे। बच्चों के साथ बैठते, उनकी बातें सुनते और समय बिताते थे।

बाद में डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने भी इस परंपरा को जारी रखा।

कलाम राखी बंधवाकर बच्चों से पूछते थे उनके सपने

राष्ट्रपति भवन की रक्षाबंधन परंपरा का एक और दिलचस्प अध्याय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से जुड़ा है।

राखी बंधवाने के बाद कलाम बच्चों से बातचीत करते थे। लेकिन उनकी बातचीत सामान्य औपचारिक सवालों तक सीमित नहीं रहती थी। वह बच्चों से उनकी हॉबी, रुचियों और पसंद के बारे में सवाल पूछते थे।

बच्चों को उनकी यह जिज्ञासा बेहद पसंद आती थी।

शायद यही वजह है कि कलाम के साथ रक्षाबंधन की यादें सिर्फ राखी और मिठाई तक सीमित नहीं रहीं। बच्चों के लिए वह मुलाकात बातचीत और सवालों से भरा एक यादगार अनुभव बन जाती थी।

राष्ट्रपति की पत्नी भी निभाती थीं इस रिश्ते में अहम भूमिका

राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन की इन पुरानी यादों में राष्ट्रपति की पत्नी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

राशिदा अहमद, जिनका बचपन राष्ट्रपति भवन में बीता, बताती हैं कि राष्ट्रपति की पत्नी स्कूली बच्चों को मिठाई और उपहार दिया करती थीं।

यानी यह आयोजन केवल राष्ट्रपति के साथ एक औपचारिक मुलाकात नहीं था। बच्चों के स्वागत से लेकर उनसे बातचीत और उपहार देने तक, पूरा माहौल पारिवारिक रखने की कोशिश होती थी।

जब राखी का धागा नर्सों और बेटियों तक पहुंचा

समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप और व्यापक होता गया।

रामनाथ कोविंद के दौर में रक्षाबंधन के मौके पर उन नर्सों को भी सम्मान मिला, जिन्होंने कोरोना महामारी के कठिन दौर में मरीजों की सेवा की थी।

वहीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सरकारी स्कूलों, केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और कस्तूरबा गांधी विद्यालयों की छात्राओं के साथ रक्षाबंधन मनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया।

उन्होंने बच्चियों से पेड़ लगाने जैसे सामाजिक संदेश भी साझा किए।

यानी एक ही त्योहार, लेकिन हर दौर में अलग संदेश।

किसी राष्ट्रपति के लिए यह बच्चों से मिलने का अवसर बना, किसी के लिए शिक्षा और जिज्ञासा से जोड़ने का माध्यम और किसी के लिए समाज के उन लोगों को सम्मान देने का मौका, जिन्होंने मुश्किल समय में सेवा की।

एक राखी में छिपा है राष्ट्रपति भवन का मानवीय चेहरा

राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन की यह कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि देश के संवैधानिक इतिहास के बीच इसमें बेहद मानवीय तस्वीरें दिखाई देती हैं।

एक तरफ देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद, दूसरी तरफ स्कूल से आई छोटी-छोटी बच्चियां। एक तरफ राष्ट्रपति भवन की औपचारिकता, दूसरी तरफ बच्चों को उपहार देतीं राजवंशी देवी। और फिर आगे चलकर बच्चों से उनकी हॉबी पूछते डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम।

यही इस परंपरा की असली खूबसूरती है।

राजेंद्र प्रसाद से आज तक, बदला अंदाज लेकिन नहीं बदला रिश्ता

डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समय शुरू हुई यह परंपरा हर राष्ट्रपति के साथ बदलती रही, लेकिन उसका मूल भाव बना रहा—बच्चों के साथ अपनापन, बेटियों का सम्मान और समाज से जुड़ाव।

शायद इसलिए राष्ट्रपति भवन की राखी की कहानी सिर्फ एक त्योहार की कहानी नहीं है।

यह देश के प्रथम राष्ट्रपति से लेकर आज तक बदलते भारत और उसकी सामाजिक सोच की एक छोटी, लेकिन बेहद दिलचस्प झलक है।

और शायद सबसे खूबसूरत बात यही है कि राष्ट्रपति भवन की ऊंची दीवारों के भीतर भी राखी का धागा हमेशा रिश्तों की गर्माहट लेकर पहुंचा।

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