CJP प्रोटेस्ट पर छात्र को नोटिस क्यों? CJI सूर्यकांत ने मजिस्ट्रेट से पूछा- ‘आपकी हिम्मत कैसे हुई?
CJP के छात्र प्रदर्शन से जुड़े मामले में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को शांति बंधपत्र का नोटिस दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। CJI सूर्यकांत ने कहा कि छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर कोर्ट पहले ही रोक लगा चुका है, फिर मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी किया। नोटिस बाद में वापस ले लिया गया।

Audio tools for this article
सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश के बावजूद छात्र को नोटिस जारी करने का मामला बुधवार को कोर्ट में पहुंचा तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सख्त नाराजगी जताई। मामला दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व वाले छात्र प्रदर्शन से जुड़ा है।
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत शांति बंधपत्र का नोटिस जारी किया गया था। जब इस मामले का जिक्र सुप्रीम कोर्ट में हुआ तो CJI सूर्यकांत ने सवाल उठाया कि जब अदालत छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुकी है, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने यह कदम कैसे उठाया।
CJI ने आदेश की अनदेखी पर जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में एफआईआर रद्द करने के साथ भविष्य में किसी छात्र के खिलाफ दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था।
CJI ने सवाल किया कि ऐसे स्पष्ट आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी मजिस्ट्रेट सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।
5 लाख का निजी मुचलका मांगा गया था
अक्षत त्रिपाठी को भेजे गए नोटिस में छह महीने तक शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरने की बात कही गई थी। इसके लिए छात्र से पांच लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो स्थानीय सक्षम जमानतदार पेश करने को कहा गया था।
नोटिस में पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया था कि छात्र अन्य विद्यार्थियों को CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था और कथित तौर पर ‘सरकार-विरोधी और भ्रामक’ जानकारी फैला रहा था।
पुलिस रिपोर्ट के आधार पर हुई थी कार्रवाई
यह नोटिस 4 सितंबर को ग्रेटर नोएडा आयुक्तालय के तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट कार्यालय से जारी किया गया था। इससे पहले सहायक पुलिस आयुक्त की ओर से BNSS की धारा 126 और 135 के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी।
इकोटेक-1 थाने के उपनिरीक्षक शिव पांडेय की रिपोर्ट, जिसे थाना प्रभारी ने आगे भेजा था, उसमें आरोप लगाया गया कि अक्षत विश्वविद्यालय के छात्रों को राजनीतिक प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहा था।
पुलिस ने आशंका जताई थी कि इससे विश्वविद्यालय परिसर में तनाव और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
छात्र ने आरोपों को बताया गलत
अक्षत त्रिपाठी ने पुलिस के आरोपों को खारिज किया है। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में उसने दावा किया कि उसने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से हिस्सा लिया था।
छात्र के मुताबिक, जिस समय प्रदर्शन हुआ उस दौरान वह विश्वविद्यालय की कक्षाओं में नहीं जा रहा था। उसने दावा किया कि विश्वविद्यालय करीब तीन महीने से बंद था।
अक्षत ने यह भी कहा कि 20 जुलाई को जब प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च कर रहे थे, तब दिल्ली पुलिस की कार्रवाई में वह घायल हुआ था।
नोटिस जारी होने के बाद ही वापस ले लिया गया
विवाद सामने आने के बाद इकोटेक थाने की पुलिस ने बताया कि छात्र को जारी नोटिस 4 सितंबर को ही निरस्त कर दिया गया था और संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी गई थी।
यानी जिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठा, वह आगे बढ़ने से पहले ही वापस ली जा चुकी थी। हालांकि, नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ऐसी कार्रवाई कैसे हुई, यही मुद्दा अब अदालत की नाराजगी का केंद्र बन गया है।
शांति बंधपत्र का नोटिस क्या होता है?
शांति बंधपत्र का नोटिस अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने या सजा देने की कार्रवाई नहीं है। यह कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका में प्रशासन की ओर से उठाया जाने वाला एहतियाती कदम होता है।
इस प्रक्रिया में संबंधित व्यक्ति से शांति बनाए रखने का आर्थिक बंधपत्र लिया जा सकता है। इस मामले में भी प्रशासन ने इसी प्रावधान के तहत छात्र से मुचलका और जमानतदार मांगे थे।
