बांग्लादेशियों के फर्जी पासपोर्ट में खुला ‘फोन कनेक्शन’, आवेदन से पहले थाने में आता था कॉल; 12 अफसर STF के रडार पर
मध्य प्रदेश में बांग्लादेशी नागरिकों के लिए कथित फर्जी भारतीय दस्तावेज और पासपोर्ट तैयार करने वाले नेटवर्क की जांच अब पुलिस और सरकारी कर्मचारियों तक पहुंच गई है। STF के मुताबिक 12 अधिकारी-कर्मचारी जांच के दायरे में हैं, जबकि संदिग्ध पासपोर्ट की संख्या 100 के पार जाने की आशंका है।

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पासपोर्ट का आवेदन थाने में पहुंचा भी नहीं होता था और उससे पहले फोन की घंटी बज जाती थी—“अर्जेंट है, जल्दी निकालो।” इसके बाद वेरिफिकेशन तेजी से पूरा हो जाता था। मध्य प्रदेश में बांग्लादेशी नागरिकों के कथित फर्जी भारतीय पासपोर्ट नेटवर्क की जांच में सामने आया यह पैटर्न अब सिस्टम के भीतर मौजूद संभावित मददगारों तक STF को ले गया है।
जांच का दायरा भोपाल, ग्वालियर, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा और बैतूल तक पहुंच चुका है। पुलिस अधिकारियों से लेकर दूसरे विभागों के कर्मचारियों तक करीब 12 लोगों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। STF इनकी सूची तैयार कर चुकी है और पूछताछ की तैयारी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि आवेदन आने से पहले थाने में फोन पहुंच रहा था तो पासपोर्ट आवेदन की जानकारी नेटवर्क तक आखिर पहुंच कैसे रही थी?
17 पासपोर्ट, पता एक और गवाह भी एक
ग्वालियर का डबरा इस नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आया है। यहां एक ही पते का इस्तेमाल कर 17 बांग्लादेशी नागरिकों के कथित भारतीय दस्तावेज और पासपोर्ट तैयार किए जाने की बात सामने आई है।
हैरानी की बात यह है कि इन मामलों में एक ही गवाह, एक ही पता और एक ही मोबाइल नंबर इस्तेमाल होने की जानकारी सामने आई है।
इसके बावजूद कथित गड़बड़ी उस समय पकड़ में क्यों नहीं आई, अब STF इसकी भी जांच कर रही है।
यह सिलसिला वर्ष 2021 से जुड़ा बताया जा रहा है।
आवेदन से पहले कौन करता था फोन?
STF की जांच में सबसे महत्वपूर्ण सुराग पासपोर्ट वेरिफिकेशन से पहले आने वाले कथित फोन कॉल हैं।
जांच में सामने आया है कि संदिग्ध आवेदन डबरा थाने में वेरिफिकेशन के लिए पहुंचने से पहले ही कॉल आ जाता था। फोन करने वाला कथित तौर पर आवेदन को अर्जेंट बताते हुए जल्दी वेरिफिकेशन करने के लिए कहता था।
इसके बाद प्रक्रिया तेजी से पूरी किए जाने की बात सामने आई है।
STF अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फोन कौन करता था, उसे आवेदन की जानकारी पहले कैसे मिलती थी और क्या पासपोर्ट वेरिफिकेशन सिस्टम के भीतर से कोई सूचना साझा कर रहा था।
तत्कालीन TI और प्रधान आरक्षक से होगी पूछताछ
जिस अवधि में डबरा से ये पासपोर्ट वेरिफाई हुए, उस दौरान विनायक शुक्ला थाना प्रभारी थे। वे वर्तमान में दतिया में DSP बताए गए हैं।
पासपोर्ट वेरिफिकेशन सेल की जिम्मेदारी प्रधान आरक्षक भूपेंद्र गुर्जर के पास थी। कुछ समय के लिए सुरेंद्र सिंह भी डबरा थाना प्रभारी रहे।
STF अब तत्कालीन अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ कर यह समझने की कोशिश करेगी कि वेरिफिकेशन की पूरी प्रक्रिया कैसे चली और संदिग्ध पैटर्न उस समय क्यों नहीं पकड़ा गया।
जांच के दायरे में होने का अर्थ किसी अधिकारी का दोषी साबित होना नहीं है। उनकी भूमिका का अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा।
गोविंदपुरा के एक पते से 40 आवेदन
रैकेट की दूसरी बड़ी कड़ी भोपाल का गोविंदपुरा बताया जा रहा है।
यहां एक ही पते का इस्तेमाल कर कथित तौर पर 40 फर्जी पासपोर्ट के आवेदन तैयार किए गए। इन्हें अलग-अलग जिलों के पासपोर्ट सेल में वेरिफिकेशन के लिए भेजे जाने और उसके बाद पासपोर्ट बनने की जानकारी सामने आई है।
इस तरह भोपाल का गोविंदपुरा और ग्वालियर का डबरा नेटवर्क के दो प्रमुख केंद्र के रूप में जांच के दायरे में हैं।
70 से शुरू जांच, आंकड़ा 100 पार जाने की आशंका
जांच अभी खत्म नहीं हुई है। STF को आशंका है कि प्रदेश में संदिग्ध तरीके से बने पासपोर्ट की संख्या 100 से अधिक हो सकती है।
एजेंसी 2021-22 और उसके बाद के वर्षों में डबरा सहित संबंधित शहरों से बने पासपोर्ट की पड़ताल कर रही है।
जांच में यदि समान पते, मोबाइल नंबर, गवाह या दस्तावेजों का पैटर्न मिलता है तो और मामले सामने आ सकते हैं।
फिलहाल करीब 70 बांग्लादेशी नागरिकों से जुड़े कथित फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट का मामला सामने आने की बात कही गई है।
2023 में विदेश मंत्रालय ने किया था आगाह
मामले में एक और गंभीर सवाल प्रशासनिक स्तर पर खड़ा हो रहा है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक विदेश मंत्रालय ने 2023 में मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय को फर्जी पासपोर्ट बनाए जाने को लेकर रिपोर्ट भेजकर आगाह किया था।
इसके बावजूद यदि संदिग्ध दस्तावेजों का सिलसिला जारी रहा तो सवाल यह है कि चेतावनी मिलने के बाद राज्य स्तर पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित जिलों तक कितनी जानकारी पहुंचाई गई।
STF की मौजूदा जांच इस कड़ी को भी महत्वपूर्ण बना सकती है।
मास्टरमाइंड रियाल के नाम पर ही चार पासपोर्ट
जांच में कथित मास्टरमाइंड रियाल चौधरी को लेकर भी चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है।
STF और पुलिस की पूछताछ के आधार पर दावा है कि रियाल के खुद के चार अलग-अलग पासपोर्ट बने थे और चारों में कथित फर्जी दस्तावेज लगाए गए थे।
बताया जा रहा है कि उसने डबरा के दो स्थानीय दलालों की मदद से दस्तावेज तैयार करवाए थे।
यदि एक ही व्यक्ति के चार पासपोर्ट अलग-अलग जगहों से बन गए तो अब जांच इस बात पर भी केंद्रित है कि अलग-अलग स्तर पर पहचान और दस्तावेजों का सत्यापन कैसे पार हुआ।
अब तक चार गिरफ्तार, आठ की तलाश
मामले में अब तक चार लोगों को पकड़े जाने की जानकारी दी गई है।
इनमें कथित मास्टरमाइंड रियाल चौधरी, जाय चौधरी बरुआ, महाराष्ट्र के उल्हासनगर से पकड़ा गया प्रियान राय और दक्षिण दिल्ली से पकड़ा गया विप्लव अधिकारी शामिल हैं।
इसके अलावा आठ अन्य लोगों की तलाश की जा रही है। STF की अलग-अलग टीमें संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं।
एसटीएफ एसपी राजेश सिंह भदौरिया के मुताबिक पांच टीमें मध्य प्रदेश के बाहर कार्रवाई में लगी हैं।
बौद्ध विहार के पते ने बढ़ाई जांच की उलझन
डबरा के जिस बौद्ध विहार के पते से 17 बांग्लादेशियों के कथित भारतीय पासपोर्ट बने, वहां के एक भिक्षु की पहचान से जुड़े दस्तावेजों में अलग-अलग नाम सामने आने की जानकारी है।
आधार कार्ड में नाम रामेश्वर जाटव, वोटर आईडी में भंते संघप्रिय और मठ की दीवार पर रांघप्रिय महाथेरो लिखा होने की बात सामने आई है।
आधार कार्ड में पिता का नाम नारायण जाटव और पता दतिया का बताया गया है, जबकि वोटर आईडी में नाम भंते संघप्रिय और पिता का नाम नारायण दर्ज होने की जानकारी है।
इस संबंध में संबंधित व्यक्ति का कहना है कि उन्होंने कुछ समय पहले बौद्ध धर्म अपनाया और इसके बाद संघप्रिय नाम रखा।
दस्तावेजों में अलग-अलग नामों की स्थिति भी अब जांच के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो गई है।
मठ में कौन आया, कितने दिन रुका—रिकॉर्ड नहीं
जांच में बौद्ध मठों की व्यवस्था से जुड़ा एक और पहलू सामने आया है।
बताया गया है कि वहां आने-जाने वाले लोगों का व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं मिला। कौन व्यक्ति आया, कहां से आया, कितने दिन रहा और कब चला गया—इसका पूरा हिसाब उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है।
इसी वजह से संदेह के आधार पर संबंधित मठों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। हालांकि जांच पूरी होने से पहले उनकी किसी आपराधिक भूमिका को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
पांच साल की फाइलें खोल रही STF
STF अब केवल गिरफ्तार आरोपियों तक सीमित नहीं है। पिछले करीब पांच वर्षों में भारतीय पहचान दस्तावेज तैयार करने से लेकर पासपोर्ट वेरिफिकेशन तक जिन विभागों और थानों से फाइलें गुजरीं, उनसे जुड़े लोगों की सूची बनाई जा रही है।
एसपी राजेश सिंह भदौरिया के मुताबिक पुलिस अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और अन्य विभागों के कर्मचारियों से पूछताछ की जाएगी। जांच में कुछ आरोपियों के दो से तीन अलग-अलग दस्तावेज मिलने की जानकारी भी सामने आई है।
अब इस पूरे नेटवर्क की सबसे अहम कड़ी वे लोग हो सकते हैं, जिन्होंने दस्तावेज तैयार होने से लेकर पुलिस वेरिफिकेशन तक रास्ता आसान किया।
STF के सामने तीन बड़े सवाल हैं—आवेदन पहुंचने से पहले थाने में फोन कौन करता था, एक ही पते और गवाह से इतनी बड़ी संख्या में पासपोर्ट कैसे पास हुए और 2023 में मिली चेतावनी के बाद भी संदिग्ध नेटवर्क समय रहते क्यों नहीं पकड़ा गया?