चाय के स्टॉल से 4,399 दिन तक: नरेंद्र मोदी की संघ से सत्ता तक की पूरी कहानी
17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 साल के हो गए। मेहसाणा के वडनगर से शुरू हुआ यह सफर संघ की शाखा, आपातकाल की भूमिगत राजनीति, भाजपा के संगठन कक्ष और गुजरात के 13 साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल से होता हुआ लगातार तीसरे प्रधानमंत्री कार्यकाल तक पहुंचा है। पढ़िए पड़ाव-दर-पड़ाव पूरी कहानी — उपलब्धियां भी, विवाद भी।

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भारतीय राजनीति में बहुत कम नेता ऐसे हुए हैं जिनका जीवन-वृत्त ही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया हो। नरेंद्र दामोदरदास मोदी उन्हीं में से एक हैं। 17 सितंबर 1950 को जन्मे मोदी आज 76 साल के हो गए। यह कहानी सिर्फ एक जन्मदिन की नहीं — यह इस बात की कहानी है कि एक कैडर-आधारित संगठन का कार्यकर्ता किस तरह देश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा, और उस रास्ते में क्या-क्या साथ चलता रहा।
वडनगर: वह पहला पड़ाव
नरेंद्र मोदी का जन्म तत्कालीन बॉम्बे राज्य (अब गुजरात) के मेहसाणा जिले के कस्बे वडनगर में हुआ। पिता दामोदरदास मूलचंद मोदी, मां हीराबेन। छह भाई-बहनों में मोदी तीसरे नंबर पर थे।
परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। वडनगर रेलवे स्टेशन पर पिता की चाय की दुकान पर बालक नरेंद्र का हाथ बंटाना — यह प्रसंग बाद में भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित बायोग्राफिकल रेफरेंस बन गया। 2014 के चुनाव अभियान में यही 'चायवाला' पहचान मोदी की सबसे मजबूत सामाजिक अपील साबित हुई।
आठ साल की उम्र के आसपास मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थानीय शाखा से जुड़े। बाल स्वयंसेवक के रूप में यह जुड़ाव आगे चलकर उनके पूरे राजनीतिक व्याकरण की नींव बना।
संन्यास की तलाश और लौटकर संघ
किशोरावस्था में मोदी ने घर छोड़ा और देश के उत्तरी तथा उत्तर-पूर्वी हिस्सों की यात्रा की। कई जीवनी-लेखकों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह यात्रा करीब डेढ़ से दो साल चली, जिसमें हिमालय क्षेत्र के आश्रम भी शामिल थे।
लौटने के बाद वे अहमदाबाद पहुंचे। यहीं संघ के संपर्क फिर सक्रिय हुए और 1971-72 के आसपास वे पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। प्रचारक जीवन का मतलब था — घर नहीं, वेतन नहीं, सिर्फ संगठन। इसी अनुशासन ने मोदी की कार्यशैली को वह रूप दिया जो आज भी उनकी पहचान है: लंबे घंटे, सीधा नियंत्रण, और संगठनात्मक विस्तार पर जोर।
आपातकाल: पहला राजनीतिक प्रशिक्षण
1975 में आपातकाल लगा और संघ पर प्रतिबंध लगा। मोदी उन कार्यकर्ताओं में थे जिन्होंने गुजरात में भूमिगत रहकर काम किया — वेश बदलना, साहित्य वितरण, नेताओं के बीच संपर्क बनाए रखना।
यह दौर मोदी के लिए दो चीजें लेकर आया: गैर-कांग्रेस राजनीति के बड़े नेटवर्क तक पहुंच, और यह समझ कि सत्ता के खिलाफ बनी धारणा कैसे जनांदोलन में बदलती है। आगे चलकर यही समझ उनके चुनावी संचार में दिखती रही।
1987: संघ से संगठन की ओर
1980 के दशक के मध्य में संघ ने मोदी को भारतीय जनता पार्टी के काम में लगाया। 1987 में उन्हें गुजरात भाजपा के संगठन का दायित्व मिला।
पहली बड़ी परीक्षा उसी साल अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में आई, जहां भाजपा के अभियान की संगठनात्मक कमान मोदी के पास थी और पार्टी को बड़ी सफलता मिली। 1990 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा 67 सीटें जीतकर चिमनभाई पटेल सरकार में गठबंधन सहयोगी बनी। 1995 में पार्टी ने पहली बार अपने दम पर गुजरात में सरकार बनाई।
इसी दौर में मोदी राष्ट्रीय स्तर की दो बड़ी यात्राओं के प्रबंधन से जुड़े — 1990 की लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ-अयोध्या रथयात्रा और 1991-92 की मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा। राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में मोदी की पहचान यहीं बनी: एक ऐसा संगठनकर्ता जो लॉजिस्टिक्स और परसेप्शन, दोनों संभाल सकता है।
दिल्ली में संगठन-मंत्री के वर्ष
1995 में मोदी भाजपा के राष्ट्रीय सचिव बनाकर दिल्ली भेजे गए। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के चुनाव प्रभार उन्हें मिले। कुछ वर्ष बाद वे महामंत्री (संगठन) बने।
यह मोदी के करियर का सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे निर्णायक चरण है। इन वर्षों में वे राज्य इकाइयों, गुटीय समीकरणों और टिकट-वितरण की मशीनरी को भीतर से समझते रहे। जब 2001 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, तब तक वे कभी कोई चुनाव नहीं लड़े थे — लेकिन पार्टी की आंतरिक व्यवस्था पर उनकी पकड़ मजबूत थी।
7 अक्टूबर 2001: गुजरात की कमान
भुज भूकंप के बाद की परिस्थितियों और संगठनात्मक असंतोष के बीच केशुभाई पटेल की जगह नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने 7 अक्टूबर 2001 को पदभार संभाला। फरवरी 2002 में राजकोट-2 उपचुनाव जीतकर वे पहली बार विधायक बने।
मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल से जो पहलें जोड़ी जाती हैं, उनमें भूकंप के बाद कच्छ का पुनर्निर्माण, ज्योतिग्राम योजना (गांवों तक 24 घंटे बिजली), वाइब्रेंट गुजरात समिट, साबरमती रिवरफ्रंट और ई-गवर्नेंस शामिल हैं। 'गुजरात मॉडल' शब्द इसी दौर की देन है — जिसे समर्थक विकास का खाका बताते हैं और आलोचक असमान सामाजिक सूचकांकों की ओर इशारा करते हुए चुनौती देते रहे हैं।
2002: सबसे कठिन अध्याय
27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगने की घटना हुई, जिसमें 59 लोगों की मौत हुई। इसके बाद गुजरात में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा भड़की।
मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की भूमिका को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी विवाद चला। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) ने 2012 में दाखिल अपनी क्लोजर रिपोर्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ अभियोजन योग्य साक्ष्य नहीं पाए थे। जून 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने SIT की क्लीन चिट को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी की याचिका खारिज कर दी थी।
यह अध्याय मोदी के राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित हिस्सा रहा है और विपक्ष तथा नागरिक समाज के एक हिस्से की आलोचना का केंद्र भी। साथ ही यह तथ्य भी दर्ज है कि इसके बाद वे 2002, 2007 और 2012 — लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते और करीब 13 साल मुख्यमंत्री रहे।
2013 से 2014: दिल्ली की ओर
जून 2013 में गोवा में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में मोदी को लोकसभा चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाया गया। 13 सितंबर 2013 को पार्टी ने उन्हें एनडीए का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया।
2014 का अभियान भारतीय चुनावी इतिहास में एक मोड़ था — रैलियों का पैमाना, 3D होलोग्राम, सोशल मीडिया का संगठित इस्तेमाल और एक ही चेहरे पर केंद्रित प्रचार। मोदी ने वडोदरा और वाराणसी, दोनों सीटों से चुनाव लड़ा और जीते; बाद में वडोदरा छोड़ दी।
भाजपा ने अपने दम पर 282 सीटें जीतीं — 1984 के बाद किसी एक पार्टी का पहला स्पष्ट बहुमत। 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
2019, 2024 और उसके बाद
2019 में भाजपा 303 सीटों के साथ लौटी और मोदी ने दूसरा कार्यकाल शुरू किया। 2024 में पार्टी अपने दम पर बहुमत से चूकी, लेकिन एनडीए गठबंधन ने बहुमत हासिल किया और 9 जून 2024 को मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। जवाहरलाल नेहरू के बाद ऐसा करने वाले वे दूसरे नेता हैं।
10 जून 2026 को मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मोदी ने लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया, जब उनका कार्यकाल 4,399 दिन का हुआ और नेहरू के 4,398 दिनों के आंकड़े से आगे निकल गया।
कहानी के मायने
नरेंद्र मोदी की कहानी को सिर्फ 'चाय बेचने वाले से प्रधानमंत्री' के फ्रेम में पढ़ना अधूरा पाठ है। असल कहानी संगठन की है — एक कैडर सिस्टम में दशकों तक बिना चुनावी पद के काम करना, संगठन की मशीनरी को भीतर से जानना, और फिर उसी मशीनरी को अपने नाम पर केंद्रित कर देना।
यही वजह है कि उनके समर्थक इसे अनुशासन और जनादेश की कहानी बताते हैं, जबकि आलोचक इसे संस्थागत केंद्रीकरण और व्यक्ति-केंद्रित राजनीति की मिसाल मानते हैं। 76 साल की उम्र में मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली और सबसे विवादित — दोनों — चेहरे बने हुए हैं। इतिहास इस दौर का मूल्यांकन कैसे करेगा, यह अभी तय होना बाकी है।

